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आखिर कब बुझेगी असुरक्षा की यह आग

‘टीम देवड़ा’ सुरक्षा उपायों में जुटी
सभी पेट्रोल कंपनियां मिलजुल कर नए सुरक्षा उपायों की रिपोर्ट तैयार करेंगी और महानिदेशालय को सौंपेंगी, महानिदेशालय दो माह में रिपोर्ट तैयार कर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को देगा। पेट्रोलियम मंत्री देवड़ा ने माना है कि सुरक्षा संबंधी और पुख्ता कानूनों की जरूरत है। उद्योग और सरकार उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे। जयपुर हादसे से प्रभावित लोगों को राहत और भावी संकट को दूर करने के लिए स्थानीय सरकार के साथ मिलकर काम होगा।

औद्योगिक सुरक्षा के नाम तमाम नियम-कानूनों के पुलिंदे तैयार करने और करोड़ों रुपये बहाने के बावजूद इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) के जयपुर टर्मिनल की आग की लपटें न सिर्फ बेगुनाह जिंदगियों को निगल गई बल्कि सैकड़ों को जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने को भी छोड़ गईं। लपटें भले ही बुझ गई हों लेकिन वहां मारे गए बेगुनाहों के परिवारों की आग फिलहाल जल्दी नहीं बुझने वाली है। आग की चपेट में आए सैकड़ों की संख्या में हताहत अस्पतालों में हैं। मामला यहीं तक सीमित रहने वाला नहीं। कुल नुकसान का अंदाजा लगभग 400 करोड़ रुपये है।

अब पेट्रोलियम मंत्रालय तेल उद्योग के सुरक्षा कानूनों की समीक्षा करने बैठ गया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री मुरली देवड़ा ने एक उच्च स्तरीय कमेटी बना दी है। यह कमेटी मौजूदा नियम-कायदों की समीक्षा कर उनकी कमियां तलाशेगी और जरूरत आधारित नए नियम बनाकर उन्हें लागू करने का प्रयास करेगी। अभी तक के नियम कायदों और कार्यान्वयन की हालत साफ हो चुकी है। अलबत्ता, कहा यही जा रहा था कि नियम-कायदे पक्के हैं और कार्यान्वयन भी। यानी जो कहा जा रहा था वह——-?

इस 29 अक्टूबर को जयपुर की आग मुरली देवड़ा टीम के लिए आत्मसमीक्षा का मौका था। उन्होंने सरकारी और निजी पेट्रोल कंपनियों की बैठक ली और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संयुक्त कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश भी दिया है।

नए सुरक्षा उपाय
आईओसी के मौजूदा पूरे ढांचागत तामझाम का सुरक्षा ऑडिट होगा। यह काम आगामी 31 दिसंबर तक पूरा हो जाएगा। इसके साथ ही मंत्रालय अब हर तिमाही के दौरान ऐसे टर्मिनल आदि के सुरक्षा मानकों का सुरक्षा ऑडिट किया करेगा। आईओसी के देश भर में 165 ऑयल टर्मिनल और डिपो हैं। टर्मिनल इसलिए ज्यादा संवेदनशील हैं क्योंकि वहीं रिफाइनरी के जरिए सीधे पाइप लाइन आती है।

इसे तकनीकी रूप से पाइप लाइप टैपिंग प्वाइंट कहा जाता है, जबकि डिपो में तेल को ढोकर पहुंचाया जाता है। इस मामले में जांच समिति भी गठित कर दी गई है और एचपीसीएल के पूर्व मुख्य प्रबंध निदेशक एम.बी. लाल की अध्यक्षता वाली समिति आग की घटना के कारणों का पता लगाएगी। समिति की रिपोर्ट दो माह के अंदर आएगी।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने ऑयल इंडस्ट्री सेफ्टी डॉयरेक्टोरेट के साथ सुरक्षा मानकों को बेहतर करने की दिशा में कदम उठाया है। इसमें सभी कंपनियों और राज्य सरकारों का सहयोग लिया जाएगा। सभी तेल कंपनियां अपनी सुरक्षा मानकों संबंधी रिपोर्ट इस महानिदेशालय को सौंपेंगी और वह अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को। जहां तक जयपुर घटना का सवाल है, मंत्रालय स्थानीय सरकार के साथ मिलकर राहत और सुरक्षा कार्य आगे बढ़ाएगा। इस महानिदेशालय की कार्यक्षमता बढ़ाई जाएगी और इसे कानूनी रूप से सक्षम बनाया जाएगा जिसके मानक लागू करना उद्योग के लिए बाध्यता होगी और उद्योग उनके लिए जवाबदेह भी होगा।

राहत कार्य
इंडियल ऑयल कॉरपोरेशन ने लगभग 250 करोड़ रुपये का पेट्रोल और अन्य परिसंपत्तियां स्वाहा होने के बाद कंपनी ने राहत कार्य संचालित करने का फैसला किया है। जयपुरवासियों की सुरक्षा के लिए वह पहला काम नया टर्मिनल स्थापित करने से शुरू करेगी। इसमें लगभग 200 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। ऐसे में राहत के आगे की कहानी हमेशा की तरह एक ही है। गरीबों को मुआवजा और टर्मिनल वाले संबंधित सीतापुर औद्योगिक क्षेत्र में स्थिति उद्योगों को भी 50 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। जान से हाथ धो बैठे लोगों के परिवारों 10 लाख रुपए। गंभीर रूप से घायलों को दो लाख रुपये और मामूली रूप से जख्मी लोगों को एक लाख रुपया।
विकास द्विवेदी

तो आबादी के बीच से हटेंगे तेल डिपो!
सांगानेर तेल डिपो में लगी आग के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय ने देश के सभी तेल डिपो की सुरक्षा की नए सिरे से समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। सभी सार्वजनिक और निजी तेल कंपनियों, रिफाइनरियों से कहा गया है कि वे 31 दिसंबर तक अपने सभी डिपो की जांच करें तथा उन्हें अति संवेदनशील, संवेदनशील और गैर संवेदनशील श्रेणियों में चिह्न्ति कर सूची सरकार को सौंपें। दूसरे, उन सभी डिपो का भी ब्यौरा तलब किया गया है जो आबादी के निकट हैं, या घनी आबादी के बीच में हैं।

पेट्रोलियम मिनिस्ट्री के अनुसार सांगानेर डिपो अग्निकांड के बाद कुछ मुद्दों पर अहम फैसले लेने होंगे। बहुत से तेल डिपो आबादी के बीच में हैं। जब ये डिपो बने थे तब वहां दूर-दूर तक आबादी नहीं थी, लेकिन बाद में शहरों का फैलाव हुआ और डिपो भी आबादी वाले क्षेत्रों के दायरे में आ गए। इसलिए बड़े शहरों के बीचोंबीच आ चुके डिपो को बंद करके उन्हें अन्यत्र ले जाना होगा। इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है। जिन डिपो के आस-पास थोड़ी-बहुत आबादी है, वहां कोशिश यह की जाएगी कि आबादी को वहां से शिफ्ट किया जाए। साथ ही भविष्य में बनने वाले नए तेल डिपो के आसपास आबादी नहीं बसने पाए, इसके पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे। मंत्रालय के अनुसार इसके लिए पेट्रोलियम कंपनियों की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। संभवत: जनवरी माह में सरकार ऐसे डिपो को चिह्न्ति कर एक्शन प्लान तैयार कर लेगी।

मंत्रालय के अनुसार देश में सरकारी और निजी मिलाकर छोटे-बड़े कुल 600 तेल डिपो हैं। इनमें से करीब 20-25 फीसदी घनी आबादी में बसे हैं जिन्हें हटाने की जरूरत पड़ सकती है। सांगनेर जैसे एक बड़े डिपो की स्थापना की कीमत करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपये होती है। दूसरे, अब मंत्रालय पेट्रोल पंपों की सुरक्षा और स्थापना संबंधी नियमों की भी नए सिरे से समीक्षा करने जा रहा है। पेट्रोल पंप भी घनी आबादी में होते हैं जिनमें हजारों लीटर पेट्रोल जमा रहता है।
मदन जैड़ा

कहीं धधक न उठे पटना
बिहार की राजधानी पटना के 15 लाख लोगों पर आग का खतरा मंडरा रहा है। अगर पटना में जयपुर की पुनरावृत्ति होती है तो कोई हैरत की बात नहीं। कहीं लोगों की लापरवाही तो कहीं कंपनी या व्यवसायियों की अनदेखी ऐसे हादसे को आमंत्रित करती दिख रही है। सिपारा टर्मिनल में आईओसी व अन्य पेट्रोलियम कंपनियों के डिपो के आसपास बसी झोंपड़पट्टी और होटलों की बात करें या पटना सिटी के खाजेकलां इलाके में अवैध तरीके से चल रही पटाखा गोदामों की। शहर में कुकुरमुत्ते की तरह रिहायशी इलाकों में तेल, डालडा, ग्रीस-मोबिल, प्लास्टिक व अन्य सामान के गोदाम हैं।

मीठापुर, गुलजारबाग, राजेंद्र नगर, न्यू बाइपास आदि इलाकों में किरासन तेल के 10 डिपो हैं। वैसे तेल डिपो हों या पेट्रोल पंप, आसपास होटल या अन्य ऐसे निर्माण हैं जिनसे हर समय आग लगने की आशंका बनी रहती है। इन जगहों पर लोग खुलेआम सिगरेट पीते हैं। डिपो के बाहरी इलाके में खुलेआम डीजल-पेट्रोल या किरासन तेल की चोरी और बिक्री होती है। इस दौरान सड़क से लेकर अन्य जगहों तक इधर-उधर तेल जमीन पर फैल  जाता है। ऐसे में एक चिंगारी भी बड़े हादसे का सबब बन सकती है। हद तो यह कि पंप पर पट्रोलियम पदार्थो की अनलोडिंग के दौरान भी बिक्री चालू रहती है जो खतरनाक है। गली-मुहल्लों में ऐसी सैकड़ों दुकानें हैं जहां बड़े सिलेंडर से छोटे सिलेंडर में अवैध तरीके से गैस भरे और बेचे जाते हैं।

तो मुश्किल होगा संभलना
अगर पटना में जयपुर के तेल डिपो की तरह आग लगी तो यहां स्थिति को संभालना मुश्किल हो जायेगा। कुछ बड़ी कंपनियों के डिपो के अंदर तो सुरक्षा के उपाय किये गये हैं पर बाहर स्थिति रामभरोसे ही है। एयरपोर्ट के पास भी अपनी मुकम्मल व्यवस्था है। वहीं अधिकांश गोदामों में भी अग्निशमन के नियम-कानून को ताक पर रख दिया गया है। पटना, कंकड़बाग, फुलवारीशरीफ, पटना सिटी और दानापुर फायर स्टेशनों को मिलाकर यहां फकत 14 दमकल हैं। बल और संसाधनों की कमी के कारण फायर ब्रिगेड की लचर हालत है। आज की तारीख में शहर में एक भी सरकारी हाइड्रेंट कारगर नहीं है। कुछ बड़े होटल व अन्य संस्थानों के हाइड्रेंट अलावा नदी-नाले और तालाब की पानी से दमकल की टंकी भरी जाती है।

हैं तैयार हम : फायर विभाग
पटना फायर स्टेशन के प्रभारी सुनील कुमार गुप्ता के मुताबिक, हर तरह के खतरे से निपटने के लिए हम तैयार हैं। एयरपोर्ट या तेल डिपो, टर्मिनल आदि के साथ निरंतर संपर्क रहता है। जुलाई 2000 में हुई विमान दुर्घटना के अलावा अन्य मौकों पर भी हमने अपनी काबलियत साबित की है।
नीतीश सोनी

दिल्ली भी ‘डेंजर ज़ोन’ में
अगर समय रहते ध्यान न दिया गया तो जयपुर जैसी भीषण त्रासदी दिल्ली में भी हो सकती है। दिल्ली में तीन तेल डिपो और दो एलपीजी बॉटलिंग प्लांट घनी आबादी वाली बस्तियों में हैं। ऑयल डिपो पंजाबी बाग, बिजवासन और दिल्ली एयरपोर्ट के डोमेस्टिक टर्मिनल के पास हैं। एलपीजी बॉटलिंग प्लांट टीकरी कलां और सरिता विहार में हैं। पश्चिमी दिल्ली के पंजाबी बाग के निवासियों के लिए ये डिपो एक अनसुने खतरे की तरफ हमेशा इशारा करते रहते हैं।

इंडियन ऑयल और एचपीसीएल का ऑयल डिपो शकूरबस्ती की रोड के दूसरी तरफ ही है। गौरतलब है कि शकूरबस्ती क्षेत्र में 1984 के दौरान एलपीजी डिपो में लगी आग ने आस-पास काफी नुकसान पहुंचाया था। रिहायशी क्षेत्र और ऑयल डिपो के बीच में दिल्ली की मैट्रो लाइन है और शिवाजी पार्क मैट्रो स्टेशन है जो शुरू होने वाला है। कुछ ही दूरी पर महाराजा अग्रसेन अस्पताल है। तीन महीने पहले ही मुंडका में तेल और लुब्रिकेंट की स्टोरेज वाले गोदाम में आग तबाही का सबब बनते-बनते बची। गनीमत थी कि समय रहते इस पर काबू पा लिया गया वरना हालात बेकाबू हो सकते थे।

जहां तक आग बुझाने की बात है तो इसके लिए वाटर ऑयल इंडस्ट्री सेफ्टी डाइरेक्टरेट (ओआईएसडी)के नार्म्स के मुताबिक ऑयल स्टोरेज डिपो और किसी स्थाई संरचना के बीच 5 कि.मी. का फासला होना चाहिए। ऑयल डिपो और बॉटलिंग प्लांट की सेफ्टी और स्टेंडर्ड के मामले की दिल्ली फायर सर्विस मॉनिटरिंग ही नहीं करती, इनकी जिम्मेदारी ओआईएसडी की है।
अनुराग मिश्र

ख़तरा देहरादून पर भी
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 21 पेट्रोल पंप और बीस गैस गोदाम हैं। अग्निशमन विभाग ने कुछ महीने पहले कई संवेदनशील पेट्रोल पंप और गैस गोदामों की सूची जिला प्रशासन को सौंपी थी। विभाग ने प्रशासन से ऐसे पेट्रोल और गैस गोदामों को नगर क्षेत्र से बाहर ले जाने की सिफारिश भी की थी। फायर ब्रिगेड के अनुसार एस्लेहाल, प्रिंस चौक, चकराता मार्ग के सभी आठ पेट्रोल पंप आबादी के लिए खतरा हैं। इसी तरह शास्त्री नगर, रेसकोर्स, पटेल नगर, पंडितवाड़ी, लक्ष्मी रोड आदि क्षेत्रों के दस गैस गोदाम अग्नि दुर्घटनाओं की दृष्टि से अति संवेदनशील हैं। शहर के बीचोंबीच स्थित लकड़ी की बड़ी मंडी को भी फायर ब्रिगेड ने अतिसंवेदनशील करार दिया है। दमकल महकमे के अनुसार राजधानी में कैसी भी आग से निपटने के लिए दो फोम टेण्डर, एक डीसीपी टेण्डर, सात वाटर टेण्डर, एक रेस्क्यू टेण्डर, एक एंबुलेंस, एक टोइंग व्हीकल, पोर्टेबल पंप, फ्लोटर पंप उपलब्ध हैं। स्टाफ भी पर्याप्त संख्या में है।

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