DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आर्थिक मंदी : प्रवासी मजदूरों का अर्थशास्त्र

हाल में विश्वव्यापी मंदी के कारण संसार के विभिन्न देशों से बड़ी संख्या में उन प्रवासी मजदूरों को निकाला गया, जो काफी अर्से से वहां काम कर रहे थे। इसकी प्रतिक्रिया सारे संसार में हुई। इस संदर्भ में कुछ सप्ताह पहले संयुक्त राष्ट्र के यूएनडीपी (यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेंट प्रोग्राम) की जो रिपोर्ट आई है, वह आंख खोल देने वाली है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सदियों से जीविका की खोज में मजदूर एक देश से दूसरे देश जाते रहे हैं और देश के अंदर भी कम विकसित तथा ग्रामीण क्षेत्रों से विकसित शहरों की ओर चले जाते हैं, जहां उन्हें जीविका का कोई न कोई साधन मिल ही जाता है।

विश्व बैंक का कहना है कि गत वर्ष प्रवासी मजदूरों ने अपने देश में अपने संबंधियों को 328 अरब डॉलर भेजे, जो गरीब देशों को अमीर देशों से दी गई आर्थिक सहायता की राशि की दुगुने से भी ज्यादा थी। बैंक का यह भी कहना है कि भारत के प्रवासी मजदूरों ने आर्थिक मंदी के बावजूद गत वर्ष 52 बिलियन डॉलर की राशि अपने सगे संबंधियों को भेजी थी, जो कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से बहुत अधिक थी। खाड़ी के देशों में पिछले अनेक वर्षो से लाखों मजदूर काम करते रहे हैं और उन्होंने भरपूर पैसा अपने सगे-संबंधियों को भेजा है।
 
बिहार और उत्तर प्रदेश के जो मजदूर खाड़ी के देशों में कार्यरत थे और जो नियमित रूप से अपने सगे-संबंधियों को पैसे भेजते रहते थे, उनके सगे संबंधियों ने इस पैसे का अधिकतर उपयोग किया बच्चों की पढ़ाई में, परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य की देखभाल में, अपने रहने के मकान को ठीक-ठाक करने में, गांव में पक्की सड़क बनाने में और लड़कियों के स्कूल का भवन बनाने में। यह सब एक तरह से उपयोगी खर्च था।

इसके विपरीत केरल के लोगों ने विदेशों से अपने भाई बंधुओं से प्राप्त हुए धन का पूरा दुरुपयोग किया। वे इसी गलतफहमी में रहे कि इस तरह का धन हर माह आता रहेगा। केरल एक ऐसा राज्य है, जहां पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बहुत अधिक है। इसलिए उम्मीद की जाती थी कि इस तरह के धन का केरल में सदुपयोग होगा। परंतु देश और विदेश के जो पत्रकार केरल घूमकर आए हैं, उन्हें यह देखकर घोर निराशा हुई है कि केरल के अधिकतर लोग, जिनके पास हर महीने विदेशों से अपने सगे-संबंधियों से मोटी रकम आती रही है, उन्होंने इसका उपयोग बड़े आलीशान महल बनाने में किया है। यह मात्र एक दिखावा है।

यह बात सच है कि दक्षिण एशिया के देशों में सरकारी तंत्र के भ्रष्ट होने के कारण सरकार के खर्च का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाता है। परंतु प्रवासी मजदूरों ने, खासकर भारतीयों ने अपने परिवार के लोगों को जो पैसा सीधे उनके पास भेजा, उसका उन्होंने पूरा सदुपयोग किया। यही पैसा यदि सरकार को दिया जाता या किसी एनजीओ को दिया जाता तो बिचौलिए इसे उड़ा ले जाते।

इस सिलसिले में अफ्रीका के कुछ देशों की एकता प्रशंसनीय है। जब जिम्बावे में अकाल पड़ा तो उस देश के नागरिक दक्षिण अफ्रीका में कार्यरत थे, उन्होंने अपने देश में पैसा भेजने के बदले अनाज, खाने का तेल और दैनिक जरूरतों की दूसरी चीजों को भेजा और हिदायत कर दी कि यह सामान गांव के सारे लोग मिल-बांट कर खाएं। ये सारा सामान उन बस ड्राइवरों के द्वारा भेजा जाता था जो दक्षिण अफ्रीका और जिम्बावे के बीच बस चलाते थे।

यूएनडीपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि मंदी की चपेट के कारण प्रवासी मजदूरों को अपने देश से निकाल बाहर कर संपन्न देशों ने बड़ी गलती की है। क्योंकि ये मजदूर सस्ती दरों पर काम करते थे और संपन्न देशों के आर्थिक विकास में जी-जान से मदद करते थे। फिर इन मजदूरों की मजदूरी से उनके संबंधियों को भेजे गए पैसे से गरीब, अविकसित और विकासशील देशों में आर्थिक विकास होता था।

अत: प्रवासी मजदूरों के कारण दोनों प्रकार के देशों को लाभ था, संपन्न देश जहां वे काम करते थे और गरीब देश जहां से वे आए थे। यह सत्य है कि एक गरीब देश जो एक डॉक्टर को तैयार करने में लाखों रुपया खर्च करता है उसका सारा खर्च बेकार जाता है। परंतु अब इस दिशा में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। डॉक्टर और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के युवक भारत आकर अपना छोटा-मोटा अस्पताल या छोटा-मोटा व्यापार शुरू कर रहे हैं। यह उन देशों के लिए चेतावनी है, जो इन प्रवासियों को अपने देश से निकालने पर तुले हुए हैं।

लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:आर्थिक मंदी : प्रवासी मजदूरों का अर्थशास्त्र