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धर्म को समझों

धर्म की विभिन्न भाषाएं हैं, पर उन सबका सार है, स्वयं में स्थित रहने का अभ्यास। धर्म की यह भाषा जितनी आंतरिक है, उतनी ही तर्क-संगत। अपने-आपको धार्मिक न मानने वाला भी धर्म की इस भाषा से विरक्त नहीं है। धर्म के प्रति जो विरक्ति है, वह उस धर्म के प्रति है, जिसमें आंतरिकता का स्पर्श नहीं है। जहां आचरण की गौणता और उपासना की प्रधानता है, वहां सहज ही बौद्घिक द्वंद्व होता है और वह व्यक्ति को धर्म-विमुख बना देता है।

क्या घृणा करने वाला व्यक्ति धार्मिक है? एक ओर उपासना और दूसरी ओर घृणा। क्या यह योग किसी बुद्घिवादी व्यक्ति को धर्म की ओर आकृष्ट करने वाला है? क्या शोषण करने वाला व्यक्ति धार्मिक है? एक ओर दया और दूसरी ओर शोषण। क्या यह योग किसी विचारशील व्यक्ति को धर्म की ओर आकृष्ट करने वाला है? धार्मिक सबके साथ प्रेम करता है, इसलिए वह घृणा नहीं कर सकता। धार्मिक व्यक्ति सब जीवों को आत्म तुल्य मानता है, इसलिए वह किसी का शोषण नहीं कर सकता। जो घृणा और शोषण करता है, वह धार्मिक नहीं हो सकता। धर्म की रुचि और उसका आचरण- ये दो भिन्न पहलू हैं। 

जो लोग अपने-आपको धार्मिक मानते हैं, उनमें अधिकांश धर्म-रुचि के मिलेंगे, धार्मिक बहुत कम। जो लोग अपने-आपको अधार्मिक मानते हैं, उनमें भी कुछ लोग धार्मिक मिलेंगे। आज का धर्म भोग से इतना आच्छन्न है कि त्याग और भोग के बीच कोई रेखा ही नहीं जान पड़ती।

धर्म का क्रांतिकारी रूप तब होता है, जब वह जन-मानस को भोग-त्याग की ओर अग्रसर करे। आज त्याग भोग के लिए अग्रसर हो रहा है। यह वह कीटाणु है, जो धर्म के स्वरूप को विकृत बना डालता है। मैं मानता हूं, धर्म जीवन की अनिवार्य अपेक्षा है। जहां उसकी पूर्ति नहीं होती, वहां जीवन में एक अभाव की पूर्ति कभी नहीं होती। वह है, मानसिक संतुलन का अभाव। मानसिक संतुलन का अभाव अर्थात शांति का अभाव। शांति का अभाव अर्थात सुखानुभूति का अभाव।

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