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गैरबराबरी की लड़ाई

नक्सलियों के समर्थक और मानवाधिकारों वाले लोग ऐसा होहल्ला मचा रहे हैं कि लड़ाई एक तरफ तीर कमान वाले आदिवासियों और दूसरी ओर अत्याधुनिक, अति शक्तिशाली सरकारी सुरक्षा बलों के बीच है। हमारे ख्याल में यह एक खतरनाक षडयंत्र है, जिसके पीछे एक भूमिगत अंतरराष्ट्रीय वामपंथी संगठन है, सोवियत संघ के विघटन और चीन के विचलन के बाद यह संगठन बना है, जिसकी योजना दुनिया के कई देशों में क्रांति करके साम्यवादी शासन स्थापित करने की है।

हमारी जानकारी के मुताबिक फिदेल कास्त्रो और माओ त्से तुंग की मृत्यु नहीं हुई है, वे भूमिगत हैं और इस विश्वव्यापी क्रांति के बाद प्रकट होंगे। लोग कह सकते हैं कि हम कुछ अतिवादी बयान दे रहे हैं, लेकिन नक्सल समस्या पर हम देख रहे हैं कि दोनों छोरों पर अतिवादी रुख ही दिख रहा है, सो हमने सोचा कि क्यों न हम भी बहती गंगा में हाथ धो लें।

बहरहाल, हमारा कहना यह है कि जो स्टैंड नक्सलियों के समर्थक ले रहे हैं, वह गलत है। यह लड़ाई वैसी गैरबराबरी की नहीं है, जैसी दिख रही है। क्या आपने कभी सुना कि किसी आदिवासी की कमान जाम हो गई, इसलिए तीर नहीं छूट पाया। पुलिस के पास जो राइफलें होती हैं, उनसे ज्यादा विश्वसनीय गुंडे बदमाशों के देसी तमंचे होते हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि पुलिस वाला बंदूक चलाए तो वह चल ही जाए।
दिल्ली पुलिस के साथ ऐसा हो चुका है कि पुलिसवालों ने डकैतों पर गोली चलाई और बंदूक जाम हो गई, सो गोली नहीं चली, तो बिहार, झारखंड और ओडिसा के ग्रामीण इलाकों की पुलिस बंदूकों का क्या हो सकता है। फिर बंदूक तीर-कमान से भारी होती है, अगर जान बचा कर भागना हो तो बंदूक हाथ में लिए भागना आसान है या तीर कमान। इसीलिए पश्चिम बंगाल के जिस थाने के थानेदार का अपहरण नक्सलियों ने किया था, उस थाने के अक्लमंद सिपाहियों ने बंदूकों को लोहे के बक्से में रखकर मालखाने में ताले में रख दिया था।

इससे नक्सली हमले के वक्त भागने में पुलिसवालों को आसानी हुई, बेचारी नक्सली तो बंदूकों वाले भारी बक्से लाद कर ले गए। किसी नक्सली की तोंद नहीं निकली होती, पुलिसवालों के मुकाबले वे तेज भाग सकते हैं। आप कहेंगे कि नक्सलियों और पुलिसवालों के बीच हथियारबंद संघर्ष होना है, कोई दिल्ली हाफ मैराथन थोड़े ही दौड़ना है। लेकिन दरअसल पुलिस संघर्ष सिर्फ निहत्थे लोगों से ही कर सकती है हथियारबंद लोगों के सामने उसकी मूल प्रवृत्ति भागने की होती है, चाहे वे शहरी गुंडे-बदमाश हों या नक्सली। बराबरी की लड़ाई चाहिए तो पहले नक्सली अपने हथियार छोड़ें, फिर देखें हमारी पुलिस कितनी शानदार है।

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