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अभी इलाज जारी

वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने आर्थिक संपादकों के सम्मेलन में जो कुछ कहा उससे यह जाहिर होता है कि सरकार मंदी से उबरने के लिए दिए गए आर्थिक पैकेज जल्दबाजी में वापस नहीं लेगी लेकिन घाटा कम करने के लिए भी उसने कमर कसना शुरू कर दिया है। आर्थिक जगत में हर वक्त कई विचार चलते रहते हैं और किसी आर्थिक उथल-पुथल के दौर में ये विचार और मतभेद ज्यादा तीखे हो जाते हैं।

सरकार की समस्या यह होती है कि उसे सचमुच आर्थिक फैसले करने होते हैं और उनके अच्छे या बुरे नतीजे भी अपने सामने देखने होते हैं, सिद्धांतकारों को यह नहीं करना होता। इस बात पर आम सहमति है कि मंदी का असर कम होने लगा है, इसलिए अब बहस इस बात पर आ गई है कि बाजार में नकदी बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को तेजी देने के लिए जो राहत पैकेज दिए गए हैं, उन्हें कब हटाया जाए, क्योंकि इसके आगे की समस्या विशाल वित्तीय घाटे की है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि जरूरत से पहले वित्तीय अनुशासन का मंदी से उबरने पर बुरा असर पड़ सकता है, इसलिए जब तक यह पक्का नहीं हो जाए कि अर्थव्यवस्था पूरी तरह पटरी पर आ गई है, राहत पैकेज चलते रहने चाहिए।
  
भारत में हालांकि अर्थव्यवस्था में सुधार के लक्षण काफी पहले दिखने लगे थे, लेकिन मानसून ने इस बार स्थिति ज्यादा जटिल बना दी है। खरीफ की फसल में कमी का असर वृद्धि दर पर भी पड़ेगा और मुद्रास्फीति भी इससे बढ़ सकती है। जानकार मानते हैं कि अगले साल मार्च तक मुद्रास्फीति लगभग पांच प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। पहले से बढ़े हुए खाद्य पदार्थो के दामों पर इसका बुरा असर पड़ेगा। इसके लिए रिजर्व बैंक ने बहुत संभलकर मुद्रा की आपूर्ति को कसना शुरू कर दिया है।

वित्तमंत्री के मुताबिक सब्सिडी घटा कर, फिजूलखर्ची पर रोक लगाकर और सरकारी उद्यमों में विनिवेश के वित्तीय घाटा कम करने की कोशिश की जाएगी, हालांकि ये सारी ही बातें कहना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन। अभी अर्थव्यवस्था उबरने के रास्ते पर है और इतनी मजबूत है कि कुछ झटके सह ले। संभवत: अगले साल के शुरू में सरकार को मुद्रास्फीति घटाने पर जरा ज्यादा चुस्ती से जुटना होगा, क्योंकि विदेशी निवेश आने की रफ्तार बढ़ रही है और खराब खरीफ फसल का असर और तेज होगा। वित्त मंत्री के भाषण से यह मालूम होता है कि सरकार बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रही है और यह अच्छा ही है।

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