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जनता की जान

लोकतंत्र और विकास की शानदार उपलब्धियों के बावजूद हम भारतीय इंसान की जान की कीमत नहीं समझ पाए हैं। यही वजह है कि एक तरफ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दो रेलगाड़ियों की चपेट में आने से 12 लोग कट कर मर गए, वहीं चंडीगढ़ पीजीआई में प्रधानमंत्री की अतिसुरक्षा के चलते गुर्दे की घातक बीमारी से जूझ रहे एक व्यक्ति ने अस्पताल के बाहर ही दम तोड़ दिया।

एक दूसरे से दूर और अलग-अलग वजहों से हुई इन मौतों की मूल वजह एक ही है। यह मौतें किसी प्राकृतिक हादसे के कारण नहीं हुई हैं। यह मानव निर्मित व्यवस्था के कारण हुई हैं । इनमें चंडीगढ़ की मौत व्यवस्था की अतिरिक्त चौकसी के कारण, जबकि राजधानी क्षेत्र की मौतें अतिरिक्त लापरवाही के चलते हुई। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अति विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा एक विशेष समस्या बन कर खड़ी हुई है।

अराजकता और राजनीतिक हिंसा के बढ़ते जाने के कारण हमारे आज के प्रधानमंत्री उस तरह से कहीं नहीं जा सकते, जिस तरह से कभी जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी आया जाया करती थीं। लोकतांत्रिक सिद्धांत के स्तर पर वह स्थिति आदर्श रही है, लेकिन व्यवहार के स्तर पर आज वह संभव नहीं है। फिर भी अगर प्रधानमंत्री के सुरक्षा घेरे में आने से किसी व्यक्ति को दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है या किसी बीमार को अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सकता तो हमें इस सुरक्षा घेरे के समय और स्थान पर फिर से विचार करना होगा। बेहतर हो वीवीआईपी से जुड़े यह औपचारिक कार्यक्रम उन स्थलों से दूर रखे जाएं, जहां से किसी को जीवन देने की राह गुजरती हो। क्योंकि हर नागरिक के जीवन को सुरक्षा देना लोकतंत्र के प्रमुख का सबसे अहम दायित्व है।

लेकिन चंडीगढ़ पीजीआई या उसके जैसे अन्य अस्पतालों के लिए दिया गया यह सुझाव गुड़गांव-फरीदाबाद पर दूसरी तरह से लागू होता है। अगर वहां राज्य की अतिरिक्त मौजूदगी घातक साबित हुई है तो गुड़गांव-फरीदाबाद में राज्य की अनुपस्थिति। देश में खुली रेलवे क्रॉसिंग, सिग्नलों की खराबी व बस स्टेशन और रेलवे स्टेशन के बीच उचित संपर्क  मार्ग न होने के कारण हादसे होते रहते हैं। अगर सही जगह पर ओवरब्रिज या सब-वे बना हो तो कोई दुस्साहसी ही पटरी पर चल कर प्लेटफॉर्म तक पहुंचना चाहेगा। यानी व्यवस्था की रफ्तार और लौहपाश के बीच इंसानी गलियारा भी देना जरूरी है।

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