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एक दिमाग, दो दुनिया बाईपोलर डिसॉर्डर

मानव मस्तिष्क की अनेक ऐसी जटिल गुत्थियां हैं, जिनके बारे में शोध जारी हैं। बाईपोलर डिसॉर्डर को ऐसी ही एक पहेली माना जा सकता है। यह ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें इससे ग्रसित व्यक्ति अपने रोजमर्रा के व्यवहार के प्रति बिल्कुल लापरवाह हो जाता है। वह अत्यधिक क्रोध या दूसरों के साथ र्दुव्यवहार करता है, अपने आप में गुमसुम या बात-बात पर वह चिड़चिड़ा दिखाई पड़ता है। कुल मिलाकर उस व्यक्ति की स्थिति खुद उसके काबू में नहीं रहती। वैज्ञानिक आकलन के अनुसार इस समस्या की कई अवस्थाएं होती हैं। इसका कोई एक निश्चित उपचार नहीं है, लेकिन इससे जूझ रहे हरेक व्यक्ति का अलग-अलग मनोवैज्ञानिक आकलन किया जाना जरूरी है। बता रहे हैं अनुराग मिश्र

इकतीस वर्षीय आदेश एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय फर्म में टेक्निकल लीडर के पद पर कार्यरत है। हमेशा जिंदादिली से जीने वाले आदेश के व्यवहार में उनके दोस्तों को पिछले कुछ महीनों से अजीब से परिवर्तन देखने को मिला। बिना किसी बात के वह एकदम से गुस्सा जाते, और कभी अचानक खुश हो जाते। घर पर भी कमोबेश आदेश का रवैया कुछ ऐसा ही है।

परेशानी बढ़ने पर जब आदेश ने मनोचिकित्सक की सलाह ली तो डॉक्टरों ने उन्हें बाईपोलर मूड डिसॉर्डर की बीमारी बताई। छह महीनों तक लगातार मनोचिकित्सक से दवाई लेने के बाद आदेश को कुछ आराम मिला। यह मामला महज आदेश का ही नहीं है, मौजूदा व्यस्त जीवनशैली में कई लोग बाईपोलर मूड डिसॉर्डर के शिकार होने लगे हैं, लेकिन परेशानी की बात ये है कि वह इसे पहचान नहीं पाते जिसकी वजह से कई बार परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है।

बाईपोलर डिसॉर्डर
बाईपोलर डिसॉर्डर के शिकार व्यक्ति का मूड जल्दी-जल्दी बदलता है। वह कभी अचानक खुश तो कभी अवसाद में पहुंच जाता है। खुशी और दुख दोनों ही अवस्थाएं सामान्य नहीं होतीं। खुशी की इस अवस्था को ‘मेनिक’ कहा जाता है।

बाईपोलर डिसॉर्डर को चार श्रेणियों में बांटा जाता है - बाईपोलर1, बाईपोलर 2, साइक्लोथीमिक डिसॉर्डर या बाईपोलर डिसऑर्डर। बाईपोलर डिसॉर्डर पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित करता है। चूंकि इसका असर दिमाग की क्रियाशीलता पर पड़ता है जिससे इसका असर लोगों की सोच, व्यवहार और महसूस करने में देखा जाता है जिसकी वजह से अन्य लोगों का उनकी स्थिति को समझ पाना मुश्किल हो जाता है।

सामान्यत: वयस्कों में ये स्थिति एक हफ्ते से लेकर, एक महीने तक रहती है। हालांकि इसकी अवधि कम भी हो सकती है। मेनिक और डिप्रेशन की स्थिति अनियमित होती है और इसका पैटर्न भी समान नहीं होता। कहने का आशय ये है कि हमेशा इसके लक्षण समान नहीं होते। बाईपोलर डिसॉर्डर की वजह से कुछ लोगों को ड्रग्स और शराब की लत लग जाती है, लेकिन बाईपोलर डिसॉर्डर से ग्रसित लोगों के लिए शराब और ड्रग्स जहर साबित होते हैं और वह व्यक्ति की स्थिति को ज्यादा खराब कर देते हैं जिससे डॉक्टर के लिए उसका उपचार करना अधिक मुश्किल हो जाता है।

बाईपोलर डिसॉर्डर का वैज्ञानिक पक्ष
हालांकि बाईपोलर डिसॉर्डर का अब तक कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक हल नहीं दिया गया है, लेकिन ज्यादातर वैज्ञानिक इसके लिए बायोकेमिकल, जेनेटिक और माहौल को जिम्मेदार मानते हैं। ऐसा दिमाग के रसायनों (न्यूरोट्रांसमीटर) में असंतुलन की वजह से होता है। न्यूरोट्रांसमीटर में असंतुलन की वजह से मूड को नियंत्रित करने वाला सिस्टम गड़बड़ा जाता है। वहीं इसके लिए जीन भी प्रमुख कारक होते हैं।

अगर आपके किसी नजदीकी को बाईपोलर डिसॉर्डर है तो किसी अन्य किसी नजदीकी को यह होने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। लेकिन इसका आशय ये नहीं निकालना चाहिए कि अगर आपके नजदीकी को बाईपोलर डिसॉर्डर है तो किसी अन्य नजदीकी को यह जरूर होगा, मतलब कि यह बीमारी आनुवांशिक नहीं होती। वहीं माहौल को भी मनोवैज्ञानिक मूड डिसॉर्डर के लिए जिम्मेदार माना जाता है। परिवार में किसी व्यक्ति की मौत, माता-पिता का तलाक और कई अन्य दर्दनाक हादसों की वजह से व्यक्ति इसका शिकार हो जाता है। ब्रेन की संरचना में डिफेक्ट की वजह से भी बाईपोलर डिसॉर्डर होता है।

उपचार
बाईपोलर डिसॉर्डर को पहचान कर इसका उपचार किया जा सकता है। वयस्कों में इस डिसॉर्डर के लक्षण पता करना ज्यादा मुश्किल नहीं है। बच्चों और किशोरों में इसके लक्षण वयस्कों जैसे नहीं होते हैं, ऐसे में इनमें लक्षण पहचानने में दिक्कत आती है। उपचार करने से पहले किशोरों के वर्तमान और बीते अनुभवों की पड़ताल की जाती है। 

इसके अलावा, परिवार के सदस्य और दोस्तों से भी व्यक्ति के व्यवहार के बारे में जानकारी ली जाती है। कई बार किशोरों में इसे पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर, अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसॉर्डर जैसा समझ लिया जाता है, जिससे इसके इलाज में मुश्किलें आती हैं। उपचार मुख्यत: व्यवहारिक लक्षणों और संकेतों के आधार पर किया जाता है। बाद में टेस्ट किए जाते हैं। 

- सीटी स्कैन ब्रेन बेंट्रीसिल्स (जहां सेरेब्रोस्पाइनल द्रव्य एकत्रित होता है) का बड़ा रूप दिखाता है। 

-ब्राइट स्पॉट को दिमाग के एमआरआई द्वारा देखा जा सकता है।
- अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन में सामने आया कि बाईपोलर डिसॉर्डर वाले लोगों में रसायन का स्नव करने वाली दिमागी कोशिकाओं की संख्या आम लोगों की तुलना में 30 प्रतिशत ज्यादा होती हैं।
- इसके अलावा उनके दिमाग में कैल्शियम या कॉर्टीसोल (एड्रीनल ग्रंथि द्वारा स्नवित स्ट्रेस हार्मोन) की अधिकता होती है।
- दिमाग के सेल रिसेप्टर में असामान्यता देखने में आती है।

ऐसे होता है इलाज
मूड स्टेबलाइजर का चयन करते वक्त व्यक्ति की उम्र, उसका वजन, डेमोग्राफिक प्रोफाइल, पारिवारिक हिस्ट्री, दवा का प्रभाव और मेटाबोलिक, एंडोक्राइन और काíडयोवस्कुलर प्रोफाइल देखा जाता है। खुराक की मात्र निश्चित करने से पहले व्यक्ति का मेडिकल प्रोफाइल जांचा जाता है। दवा का प्रभाव जांचने के लिए व्यक्ति का ईसीजी, डायबिटीज और थायरॉयड टेस्ट किया जाता है। मूड को स्थिर रखने के लिए दो से तीन साल तक दवा दी जाती है। तकरीबन आधा आराम शुरुआती छह महीनों में मिल जाता है। बाईपोलर डिसॉर्डर और थायरॉयड आपस में जुड़े होते हैं।

जीवनशैली है जिम्मेदार
ज्यादातर स्थितियों में इसके लक्षणों को पहचाना नहीं जाता। नौकरी में व्यस्तता, परेशानी, वैवाहिक समस्याओं, स्टॉक मार्केट में हताशा, प्रॉपर्टी के झगड़ों और बच्चों से विवाद जैसी परेशानियों की वजह से बाईपोलर डिसॉर्डर की समस्याएं होती हैं।

लक्षण
मेनिया की स्थिति
- तेज बोलना और अनावश्यक विचार आना 
- ऊर्जा स्तर बढ़ना 
- नींद कम आना 
- मूड में परिवर्तन और ज्यादा आशावादी होना 
- शारीरिक और मानसिक गतिविधियों में सक्रियता 
- आक्रामक व्यवहार
- चिडचिड़ा स्वभाव 
- ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल  
- गलत फैसले लेना, खराब ड्राइविंग 
- खुद को सीमा से अधिक तवज्जो देना

डिप्रेशन की स्थिति 
- सामान्य गतिविधियों में कमी
- आलस्य और ऊर्जा में कमी 
- लंबे समय तक उदासी की अवस्था
- ज्यादा नींद या बैचेनी के कारण नींद न आना
- ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत
- किसी भी कार्य में खुशी महसूस न होना
- भूख में कमी या बेतरतीब खाना
- गुस्सा, चिंता और बैचेनी
- विचार शून्यता या आत्महत्या

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