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बारातों के इंतजार में यूँ ही बीत गईं रातें

हरदोई से करीब 50 किलोमीटर दूर मल्लावाँ ब्लाक का मल्लाहनपुरवा गाँव। ऐसा गाँव जहाँ इस समय हर घर को बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधाओं के बजाए इंतजार है बहू का। इस गाँव से बारात निकले हुए अरसा हो गया। माँएँ अपने बेटों के लिए रिश्तों की राह तकते-तकते थक चुकी हैं। मंडप, मंगलगीत और बैण्ड यहाँ के लोगों के लिए किताबी बातें हो गई हैं। 60 साल के चतुरी हों या नवयुवा मनोरथ..गाँव कुँवारों से भरा पड़ा है।

गंगा की कटरी के किनारे बसे इस बेहाल गाँव में ऐसा नहीं है कि लोग शादी के लिए रिश्ते लेकर नहीं आते। गाँव की हालत ऐसी है कि जो यहाँ एक बार आता है वह ऐसा भागता है कि फिर कभी नहीं लौटता।
लोध बाहुल्य मल्लाहनपुरवा में सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएँ तो दूर सलीके के कच्चे मकान भी नहीं हैं। 60 साल के चतुरी के लिए अंतिम रिश्ता तब आया था जब वह 28 साल के थे। लेकिन लड़की वाले बिना बात किए ही लौट गए। तब से आज तक न रिश्ता आया और न शादी की बात हुई। हँस कर बोले कि इस उम्र में अब शादी का ख्याल भी छोड़ चुके हैं। 45 साल के रघुनंदन बोले कि अब तो खुद ही चूल्हा फूँकने की आदत हो गई है। तीन जवान बेटों की माँ सुरती अपनी किस्मत को दोष दे रही हैं कि कोई उनके घर अपनी बेटी नहीं ब्याहना चाहता।

गाँव के बूढ़े-बुजुर्गो ने बेटों की शादी के लिए मंदिरों और मजारों के चक्कर लगा डाले। पैरों में छाले पड़ गए पर बेटों के सेहरे के फूल नहीं खिले। राम नारायण, रतीराम, रामचन्दर, रम्मन और राजेन्द्र के साथ रामदयाल तक ऐसे पिता हैं जो अपने बेटों के लिए रिश्ता तलाश करते-करते थककर बैठ गए। गाँव के गंगा सहाय, जगदीश, गौरी शंकर, अशर्फी और भारत ने बताया कि बेटे कमाने बाहर तो गए लेकिन उनकी शादी भी नहीं हो सकी।

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