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अच्छी शुरुआत और अड़ंगों का अंबार

शायद यह सरकार का नया मूलमंत्र है-  जो टूट गया उसे भूल जाओ। मरम्मत से बेहतर है, नया बना लो। बाकी विस्तार में जाने की जरूरत नहीं। मैं उस क्षेत्र के बारे में बात कर रही हूं, जिसे सरकार भविष्य की रीढ़ मानती है।

नया तरीका है अलग प्राधिकरण बना दो। ऐसी संस्थाएं जो विभाग की कार्यप्रणाली से स्वतंत्र हों। किसी भी योजना को लागू करने और नियामक के पहल के लिए इनका ही सहारा लिया जा रहा है। मुझे लगता है कि अब इन सबकी समीक्षा का वक्त आ गया है। उदाहरण के लिए हम उस प्राधिकरण की बात करते हैं, जिसे त्वरित विकास के मकसद से बनाया गया था, यानी पेट्रोलियम और नेचुरल गैस रेगूलेटरी बोर्ड।

इसका मकसद साफ है कि पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रलय त्वरित विकास के इस क्षेत्र को सिरे चढ़ाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए एक ऐसी स्वतंत्र एजेंसी होनी चाहिए, जिसके इस क्षेत्र में निहित स्वार्थ नहीं हैं। दूसरे क्षेत्रों में बोर्ड जो कर रहा है उसके बारे में मैं बहुत कुछ नहीं कह सकती, लेकिन कंप्रेस्ड नेचुरल गैस यानी सीएनजी के देशव्यापी नेटवर्क के बारे में जरूर कह सकती हूं। हमारे शहरों को विषैली गैसों से मुक्त कराने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता था, बोर्ड उस सब पर ठंडा पानी डाल रहा है।

इसे विस्तार से समझते हैं। दिल्ली में वायु प्रदूषण को खत्म करने के लिए जब पहली बार सीएनजी का इस्तेमाल शुरू हुआ तो यह एक नई चीज थी। जब हमने सीएनजी का तर्क दिया था तो हमें यह कहा गया कि इतने बड़े पैमाने पर बदलाव पूरी दुनिया में कभी पूरी तरह से नहीं हो सका। ऐसे आंकड़े दिए गए जिनसे पूरी योजना ही ठंडे बस्ते में चली जाए। कहा गया कि इस योजना को सबसे बड़े स्तर पर चलाने वाले शहर लॉस एंजेल्स में सिर्फ 800 गाड़ियां ही सीएनजी से चलती हैं। इसके पीछे सोच यह थी कि सीएनजी कभी दिल्ली में काम नहीं करेगी। हमने इस पर जोर दिया कि दिल्ली की समस्या को खत्म करने का यही सबसे वैज्ञानिक तरीका है।

हमारे हस्तक्षेप की वजह से डीजल को हालांकि स्वच्छ बना दिया गया था, लेकिन फिर भी यह काफी खतरनाक प्रदूषण फैला रहा था। भारत में अभी भी सबसे स्वच्छ किस्म का डीजल इस्तेमाल नहीं होता है, जो यूरो फाइव या भारत फाइव का स्टैंडर्ड है। सीएनजी का रास्ता इससे ज्यादा आसान और समझदारी भरा था। हम उत्सजर्न के मामले में यूरोप से 15 साल पीछे चल रहे हैं, इससे हम एक झटके में उनके बराबर पहुंच जाते, और पहुंचे भी।

ऐसा लग रहा था कि यह बदलाव लागू करना आसान नहीं होगा। गैस कंप्रैसन और डिस्पेंसिंग के लिए कोई तकनीक उपलब्ध नहीं थी। वाहन निर्माता नहीं जानते थे कि गैस के इस्तेमाल वाले कुशल और सुरक्षित वाहन कैसे बनाए जाएं। एक तरफ अनुभव नहीं था और दूसरी तरफ इसे रोकने वाले कईं निहित स्वार्थ थे और नौकरशाही तो थी ही। प्रदूषण की समस्या से तुरंत निपटना था और इसका कोई विकल्प नहीं था कि तेजी से काम करते हुए उसे सीखा जाए। मुझे पता था कि इसे लागू करने के लिए हर जानकारी सटीक होनी चाहिए गैस प्रेशर से नोज़ल के डिजाइन तक। इसके वितरण का नेटवर्क और कीमत लागत वगैरह भी।

दिल्ली के सीएनजी कार्यक्रम से काफी कुछ हासिल हुआ- स्वच्छ हवा तो खैर मिली ही, तकनीक के क्षेत्र में नई उपलब्धि हासिल हुई, वाहन निर्माताओं ने सुरक्षा की नई तकनीक विकसित की। पांच साल में यह बाजार पूरी तरह परिपक्व हो गया है। अब सीएनजी का इस्तेमाल देश के कई अन्य शहरों में भी किया जा सकता है। इससे दोहरा फायदा होगा, एक तो स्वच्छ ईंधन पर चलने वाली सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बनेगी और दूसरे हवा स्वच्छ होगी।

इसी बीच सरकार ने चीजों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए पेट्रोलियम और नेचुरल गैस रेगुलेटरी बोर्ड बन दिया। लेकिन तेजी से आगे बढ़ने के बजाए हम पीछे की ओर खिसकने लगे। अब जब हमें पता चला है कि देश में भारी गैस रिजर्व है, लेकिन इसके लिए कोई कोशिश नहीं हो रही है। बावजूद इसके कि इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य को काफी फायदा पहुंच सकता है।

नतीजा यह है कि पिछले तीन साल में कोई नई सीएनजी परियोजना शुरू नहीं हुई। इससे भी बदतर यह है कि पहली योजना में भी लंगड़ी लगाने की कोशिश शुरू हो गई है। बोर्ड ने सीएनजी की आपूर्ति करने वाली मौजूदा एजेंसियों जैसे इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (निजी व सार्वजनिक क्षेत्र की साझा कंपनी) की वैधानिकता पर ही सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। कई महीनों के पचड़े के बाद यह समस्या अब किसी तरह सुलझा ली गई है।

अब जिस बात पर विवाद है, वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के भारी प्रदूषण वाले इलाकों का जो आखिर में दिल्ली की हवा की गुणवत्ता पर भी असर डालता है। ताजा आंकड़ों के हिसाब से तकरीबन 12 लाख वाहन हर रोज दिल्ली और पड़ोसी शहरों के बीच चलते हैं। जाहिर है कि अगर दिल्ली की हवा का स्तर सुधारना है तो इनके ईंधन को भी बदलना होगा। काफी लंबे विमर्श के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली की सरकारें इस बात पर सहमत हुई हैं कि उन्हें सार्वजनिक वाहनों को आने-जाने दिया जाएगा, जो सीएनजी से चल रहे होंगे।

यह योजना आगे बढ़ पाती उससे पहील ही अड़ंगा आ गया। स्पर्धा के नाम पर बोर्ड ने इसमें बाधा खड़ी कर दी। मामला इस समय अदालत में है और इससे सिर्फ समय ही जाया होगा। जनता का स्वास्थ्य तो खतरे में रहेगा ही। मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल है कि क्या हम भविष्य के हिसाब से आपूर्ति, नियमन और विकास के सही ढंग के संस्थान खड़े कर रहे हैं? ऐसा ही एक मामला खाद्य सुरक्षा और मानकीकरण का भी है।
इस पर अगली बार विस्तार से चर्चा करेंगे। 

लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की निदेशक हैं

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