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ब्लॉग वार्ता : प्राचीन सभ्यताओं की वकालत

इलाहाबाद के वीरेंद्र कुमार सिंह चौधरी पेशे से वकील हैं। लेकिन ब्लॉग पर वो सभ्याताओं के मुकदमें की वकालत करते रहते हैं। मिस्त्र की पिरामिड पर लिख रहे हैं। कैसे पुजारियों का वर्चस्व रहा। दैवी सभ्यता के रूप में जीता रहा, लेकिन दास प्रथा का कलंक भी लगाए रहा।

पिरामिड को देख वीरेंद्र जी को सुमित्रनंदन पंत की ताजमहल पर लिखी कविता याद आती है। हाय मृत्यु का कैसा अमर अपार्थिव पूजन, जबकि विषण्ण निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन। गीजा का विशाल पिरामिड 20 साल में एक लाख लोगों के श्रम से क्यों बना, ये सब जानना है तो वीरेंद्र जी के ब्लॉग मेरी कलम से पर जाइये।

क्लिक कीजिए http://v-k-s-c.blogspot.com वीरेंद्र कुमार सिंह इलाहाबाद उच्च न्यायलय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और शिक्षा के प्रचार प्रसार के काम से जुड़े हैं। कहते हैं कि गीजा का पिरामिड बनाने के लिए बीस साल तक कैसे दासों का इस्तेमाल किया गया होगा। कैसी सभ्यता रही होगी? यह सोच कर ही सिहर जाता है।
   
वास्तव में मानव इतिहास संवत्सरों का क्रम और साम्राज्यों की उथल-पुथल में लगी नामावलियां नहीं, वह मानव के विचारों की कहानी है। विश्व विजेता बनने का स्वप्न देखने वाले आक्रमणकारी और बड़े साम्राज्यों की स्थापना करने का दंभ भरने वाले अनेक बार सभ्यता में महामारी बनकर आए और अपनी विनाशलीला फैलाकर चले गए। आज इतिहास उन्हें महान कहकर गुणगान करता है और उनकी खुशामदों की चाटुकारी को उद्घृत करता है। सांस्कृतिक प्रवाह में सबका मूल्यांकन चाहिए।

इतिहास को लेकर यह सवाल हमेशा से रहे हैं। लेकिन अब यह सवाल पुराना पड़ रहा है। खासकर हिंदुत्ववादी राजनीति ने इतिहास के ऐसे सवालों को किसी नेता की सोच से तय करने की जिद के कारण मुर्दा बना दिया। कोई इतिहासकार चाटुकारिता में गुणगान नहीं करता। जो करता है वो इतिहासकार नहीं बल्कि इसके बहाने राजनीति से लाभ लेने वाला छोटे लेवल का नेता है। लेकिन वीरेंद्र जी का मूल्यांकन जारी है। वे सभ्यताओं को लेकर बंद पड़ चुकी बहस को अपने कोने से जिंदा कर रहे हैं। बस उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इतिहास लेखन कितना बदल गया है।
    
वीरेंद्र जी के लिखे हुए को करीब से पढ़ने पर सभ्यता का उद्गम, कुरीतियां, समाज के नियम और एक वकील की नज़र, इन सबका मिश्रण दिखता है। वे बता रहे हैं कि कैसे द्वितीय विश्वयुद्घ के बाद तरह-तरह के कंट्रोल करने वाले कानून बने। सारे द्वार, खिड़कियां, रोशनदान और झरोखे, सबमें मोटा-काला परदा डालकर रखो, मोटरों की हेड लैंप के ऊपरी भाग में कालिख पोत दो। राशन पद्घति लागू हो गई। इंग्लैंड में सप्ताह में केवल एक मक्खन की टिकिया, वह भी मां बनने वाली को दी जाने लगी। इनमें से कुछ नियम युद्घ के बाद भी चलते रहे। युद्घरत देशों में ऐसा होता है।
    
भारत भी हजारों वषों से युद्घरत है। बकौल वीरेंद्र जी इसी अवस्था के कारण समाज को बचाने के लिए ऐसे नियम बने। बता रहे हैं कि न्यूयार्क में बार संघ के प्रांगण में तीन मूर्तियां लगी हैं। एक मूर्ति मनु की भी है।
   
फिलीपीन के नए लोकसभा भवन के सम्मुख जिनकी मूर्तियां स्थापित हैं, उनमें एक मनु हैं। भारत की राजनीति की कई धारायें मनु को आलोचनात्मक नजरिये से देखती हैं। भले ही कानून बने होंगे, लेकिन कानून बनाने के पीछे की जो सोच होती है, उसके बड़े भयंकर सामाजिक परिणाम होते हैं। मनु का कानून सार्वभौम नहीं था। इस भूखंड की एक बड़ी आबादी उस कानून से बराबरी का हक नहीं पाती थी।
    
प्रारंभ में आदि मानव ने संसार को वैसे ही देखा होगा, जैसे शिशु अपने मकान के छोटे से संसार को देखता है। यह है, इतना ही भाव उसके लिए पर्याप्त है। वीरेंद्र जी सभ्यताओं की कहानियों को मानव जिज्ञासाओं और संघषों के बीच खोज रहे हैं। समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कोई ठोस रास्ता नहीं निकाल पाते।
    
अनुभव से मानव ने बीमारी का संबंध अनेक प्रकार की गंद्गी और छूत से लगाया। इसी से शुचिता के भाव उत्पन्न हुए। भारतीय जीवन में छुआछूत के विचार इसी से आए। इनकी विकृति भी बाद में आई। वीरेंद्र जी को समझना चाहिए कि इन्हीं विकृतियों के खिलाफ अंबेडकर, गांधी और कांशीराम उग्र रूप से खड़े हो गए। वो इंसान के साफ-सुथरे रहने के खिलाफ नहीं थे।
   
आज ये बुराइयां जिस रूप में हैं, उन्हीं को खत्म करने की बात हो रही है। अब यह प्रासंगिक नहीं है कि उनका उद्गम कैसे हुआ था। इन्हें खत्म होना ही चाहिए। भले ही इनसे किसी काल खंड में किसी को गर्व होता होगा। आज के काल खंड में इनसे एक बड़ी आबादी को जलालत उठानी पड़ती है। वकील फैसला नहीं करता। वो दलील देता है।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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