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मूरख आस करे ..

मात्र भौतिक समृद्धि या अमीरी को जिंदगी का मकसद मानने वाले लोग एक तरफ महंगाई का रोना अलापते नहीं थकते तो दूसरी तरफ प्रतिस्पर्धा का प्रदर्शन या दिखावे के फेर में पड़कर महंगी वस्तुओं की खरीदारी में, लग्जरी टाइप भवन के निर्माण में तथा पारिवारिक उत्सवों में औकात से ज्यादा खूब धन व्यय भी करते देखे जाते हैं।

अपनी दौलतमंदी में मगरूर इंसान भूल जाता है कि इक दिन मिट जाना है माटी के मोल और सब ठाठ धरा रह जाना है, जैसे-तैसे दौलत बटोरने में अपनी सारी जिंदगी तथा ऊर्जा मात्र भौतिक नाशवान संसाधनों के संग्रह में खत्म हो जानी है। कोई भी इस मायाजाल से निकलने के प्रति गंभीर नहीं, मूढ़मति को गोविन्द भजन में प्रेरित करने के वास्ते उसकी दैहिक हालत का वास्ता देते शंकराचार्य ने चेताया था-

अंगं गलितं पलितं मुण्डं दशन-विहीनं जातं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दंडं, तदपि न मुंचति आशा-पिण्डम्।।

इसी भाव को हिन्दी के इस भजन में स्वामी ब्रह्मनंद ने गाया था- ‘अब तो तजो नर रति विषयन की/ कर ले फिकर परलोक-गमन की/ बालपणा जिम गई जुवानी/ सुंदर काया भई पुरानी/ तदपि मिटे नहीं लालच मन की/ जरा (बुढ़ापा) दूत यमराज पठाया/ रोग फौज संग लेकर आया/ मूरख आस करे क्या तनकी।’

हमारे ऋषियों-मुनियों ने आध्यात्मिक ग्रंथों में, मध्यकालीन सूफी संतों ने पदों-साखियों व कलामों में तथा लोकगीतों में बारबार उद्बोधित किया है कि इस दुर्लभ मानव जीवन को ध्यान के केन्द्र में रखकर अपरिग्रही बनो, लालच में मत पड़ो, ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत’ कहने वाले भौतिकवादी चार्वाकों को ठेंगा दिखाकर ठुकरा दो। बड़े पुण्य कर्मो से प्राप्त इस मनुष्य-जन्म को ईश्वर के प्रेम में मगन कर दो और उस सूफी फकीर मोहम्मद बख्श की सिरायकी बोली में गेय इन पंक्तियों में दी गई चेतावनी महत्वपूर्ण है -
जिन्हा ‘इश्क’ खरीद न कीता एवें आए विगुत्ते
इश्क बांझों फरक न कोई क्या आदम क्या कुत्ते।।

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