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पारदर्शिता की पूंजी

सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति की घोषणा लोकतंत्र की जीत है। देर से ही सही पर इस स्वैच्छिक घोषणा से भी कानून के शासन और न्यायिक जवाबदेही के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ेगा। इसीलिए इस घोषणा का चौतरफा स्वागत किया गया है। हालांकि इसे सूचना के अधिकार के दायरे के तहत लाने वाले हाई कोर्ट के एकल जज राजेंद्र भट्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने हाई कोर्ट के दो जजों की पीठ के समक्ष अपील दायर कर रखी है और उसकी सुनवाई इसी महीने होनी है।

जाहिर है जजों की तरफ से संपत्ति की स्वैच्छिक घोषणा से उस मुकदमे की चर्चा एक बदली हुई परिस्थितियों के दायरे में होगी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्रीय सूचना आयुक्त के उस आदेश को सही ठहराया था, जिसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी आरटीआई के तहत मांगी गई अपनी सूचना देने को बाध्य होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को चुनौती दे रखी है और दूसरी तरफ न्यायिक जवाबदेही और सुधार का अभियान चलाने वाले वकीलों और जजों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि संपत्ति की घोषणा को अनिवार्य बनाया जाए। क्योंकि मौजूदा स्थिति में कुछ जज अपनी घोषणा नहीं भी कर सकते।

इतना ही नहीं, मांग यह भी की जा रही है कि संपत्ति की इस सूची में तारीख और स्थान का स्पष्ट ब्योरा होना चाहिए। यह भी बताया जाना चाहिए कि कौन सी संपत्ति कब और कहां खरीदी गई। इस तरह वे जजों के मौजूदा निर्णय को सकारात्मक दिशा में उठाया गया एक कदम जरूर मानते हैं, लेकिन न्यायपालिका को इससे और आगे ले जाना चाहते हैं।
  
यहां यह बात ध्यान देने की है कि जजों ने संपत्ति की घोषणा करते हुए इसे सात मई 1997 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पारित प्रस्ताव के अनुरूप बताया है। लेकिन इन बारह वर्षो में बड़ी प्रगति यह हुई है कि स्वैच्छिक घोषणा के उस संकल्प में जो सूचना मुख्य न्यायाधीश के पास गोपनीय रहनी थी, उसे आज ऑनलाइन करना पड़ा है।

यह भी मांग है कि सुप्रीम कोर्ट उस वीरास्वामी फैसले को पलटे, जिसके तहत जजों पर आपराधिक जांच से पहले सरकारी एजंसी को मुख्य न्यायाधीश से इजाजत लेनी अनिवार्य है। इसके अलावा न्यायिक परिषद और उसके तहत स्वतंत्र न्यायिक शिकायत आयोग गठित करने की भी मांग चल रही है, ताकि जजों की किसी भी वित्तीय अनियमितता को छुपाया न जा सके। निश्चित तौर पर यह सब परिपक्व होते लोकतांत्रिक जनमत का ही असर है।

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