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सवालों में घिरी जीत

अफगानिस्तान में हमीद करजई के एकमात्र प्रतिद्वंद्वी डॉ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला के नाम वापस लेने से करजई को राष्ट्रपति पद फिर से मिल गया है, लेकिन अब उन्हें अपनी विश्वसनीयता बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ सकती है। तालिबान और उनके समर्थक तो उन्हें राष्ट्रपति मानते ही नहीं, लेकिन आम अफगानियों के लिए भी करजई विशेष सम्मान के पात्र नहीं हैं। उनकी सरकार पर भारी भ्रष्टाचार और निकम्मेपन के आरोप लगे हैं और चुनावों में धांधली के आरोपों ने बची-खुची कसर भी पूरी कर दी। 

चुनाव आयोग तो दूसरी बार मतदान कराना चाहता था, लेकिन फिर धांधली और व्यापक हिंसा की आशंका की वजह से तमाम संबंधित पक्षों ने अब्दुल्ला पर दबाव डाला कि वे चुनाव से हट जाएं। लेकिन यह साफ है कि अब्दुल्ला से कुछ वायदे तो किए ही गए होंगे, इसके अलावा अमेरिका और दूसरे नाटो सदस्य देशों को भी लग रहा है कि करजई को ज्यादा जवाबदेह और सक्रिय होना चाहिए। इसीलिए करजई ने घोषणा की है कि वे ज्यादा समवेशी सरकार बनाएंगे और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग उनका मुख्य मुद्दा रहेगा। 

करजई की सरकार का कामकाज ऐसा रहा है कि उनसे पश्चिमी देशों और लोकतंत्र समर्थकों को जो उम्मीदें थीं वे पूरी नहीं हुईं। बजाय इसके कि वे तालिबान समर्थकों को अपने पक्ष में करते उन्होंने अपने पक्ष के कई ताकतवर लोगों को विरोधी बना लिया। पश्चिमी देशों को जो उम्मीद थी कि विकास के कामों से वे अफगानी जनता को तालिबान से बिमुख कर पाएंगे, वह उम्मीद भी ऐसी सरकार से पूरी नहीं हुई जो बहुत निकम्मी मानी जाती है। अमेरिका के लिए भी अफगानिस्तान में लंबे समय तक टिके रहना संभव नहीं है और बाहर जिनकलने की किसी भी अमेरिकी नीति का मुख्य आधार काबुल में कम से कम एक ठीक ठाक सरकार का होना है।

वैसे अमेरिका से जो संकेत मिल रहे हैं वे करजई को शायद अपना कामकाज दुरुस्त करने के लिए मजबूर करें क्योंकि यह साफ है कि करजई के लिए अमेरिकी मदद आइंदा घटनी ही है, बढ़नी तो नहीं है। करजई ने एक और कार्यकाल पा तो लिया है लेकिन यह कार्यकाल उनके पिछले कार्यकाल से बहुत ज्यादा कठिन होने वाला है। अगर वे कसौटी पर खरे उतरे तो इतिहास में गौरव के साथ याद किए जाएंगे और असफलता की कीमत बहुत भारी हो सकती है।

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