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प्रसार भारती में महिलाएं

संसदीय समिति की यह राय चौंकाने वाली है कि प्रसार भारती के दोनों घटकों दूरदर्शन और आकाशवाणी में यौन उत्पीड़न की शिकायतों की संख्या का कम होना महिला कर्मचारियों के अपने अधिकारों और विशेषाधिकारों से अवगत नहीं होना है। इस समिति ने यह राय चौदहवीं लोकसभा के आखिरी सत्र में पेश रिपोर्ट में गत तीन वषों से दूरदर्शन में यौन उत्पीड़न की केवल एक शिकायत और आकाशवाणी में छह शिकायतों के आधार पर जाहिर की है। समिति ने ये सिफारिश की है कि शिकायतों के निवारण के प्रावधानों को बार-बार परिपत्रों के माध्यम से प्रसार भारती में कार्यरत सभी महिला कर्मचारियों के ध्यान में लाया जाए। समिति का ये भी मानना है कि कैजुअल महिला कर्मचारियों का कार्य स्थल पर उत्पीड़न होने की अधिक आशंका रहती है। दरअसल पूरे संदर्भ स काटकर यदि समिति की इस राय पर कोई टिप्पणी की जाए तो यह महिलाओं को यौन उत्पीड़न की शिकायतों को दर्ज करान के लिए उकसाने जैसी बात लग सकती है। लकिन यदि समिति के विषय और उसके अध्यन के विभिन्न पहलुओं के आलोक में इस राय को देखा जाए तो यह ठीक लगती है। आकाशवाणी और दूरदर्शन को संचालित करने वाले प्रसार भारती बोर्ड के पन्द्रह सदस्यों में केवल एक महिला प्रतिनिधि है और वह भी अंशकालीन है। मीडिया के इन दो बड़े संस्थानों में 40 हजार कर्मचारी हैं लकिन इनमें सिर्फ आठ प्रतिशत महिलाएं है। दूरदर्शन में जिन 21708 स्वीकृत पदों में से 1701पर नियुक्तियां की गई है उनमें 1353 महिलाएं हैं । लेकिन इनमें सबसे ज्यादा श्रेणी ग के पदों पर कुल 10513 में 620 महिलाएं है। आकाशवाणी में 2वीकृत पदों में 222पर ही नियुक्ितयां की गई हैं और उनमें घ श्रेणी में एक भी महिला नहीं है। आकाशवाणी को प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दूरदर्शन के मुकाबले बड़ा संगठन मानते हैं लकिन वहां क श्रेणी के पदों पर केवल 14 प्रतिशत महिलाएं है जबकि दूरदर्शन में 25 प्रतिशत हैं। जिस तरह से महिलाओं की संख्या कम है, उसी तरह से दलित और आदिवासी पुरुष महिलाओं की तादाद भी कम हैं। दूरदर्शन में कुल 4714 दलित और आदिवासी है और उनमें महिलाओं की संख्या 203 और 101 हैं। इन आकंड़ों से प्रसार भारती में महिलाओं के लिए काम की परिस्थितियों का एक मोटा अंदाजा मिल सकता है। उसकी तहों में जान के लिए इन आंकड़ों का जानना जरूरी है। डीडी न्यूज के अतिरिक्त विभिन्न दूरदर्शन केन्द्रों में 306 अनियमित कर्मचारियों में 103 महिलाएं हैं। आकाशवाणी में 20नैमितिक महिला कर्मचारी हैं जा कुल नैमितिक कर्मचारियों की 20 प्रतिशत है। इसके साथ ये भी तथ्य है कि दूरदर्शन में जहां अनियमित कर्मचारियों को एक महीने में 1दिनों तक काम दिया जा सकता है तो आकाशवाणी में महीने में केवल छह दिनों के लिए ही काम दिया जा सकता है। दरअसल जिस तरह से इस बात का कोई जवाब नहीं है कि प्रसार भारती के ही दो जुड़वां बेटे या बेटियां हैं तो दो तरह की प्रथा क्यों चलाई जा रही है। इसी तरह से दूसरे सवालों के भी जवाब नहीं है कि दूरदर्शन में केवल क और ख समूह के 44.8 प्रतिशत और 40 प्रतिशत एवं आकाशवाणी में क समूह के 58़ 8 प्रतिशत पद रिक्त क्यों पड़े है। क्या इसका संबंध इस बात से नहीं है कि अस्थायी पदों पर काम करान की प्रथा में एक हित विकसित हो गया है और वह हित एक स्तर पर पुरुषवाद से जुड़ा है? समिति ने बताया है कि 2880 नैमितिक कर्मचारियों में बड़ी संख्या में महिलाएं है जो कि दस से पन्द्रह वषों से ज्यादा समय से आकाशवाणी और दूरदर्शन में समाचार वाचक, एंकर, समाचार अनुवादक, न्यूज मॉनीटर, कार्यक्रम निर्माण सहायक आदि के रूप में कार्य कर रहीं है। विभिन्न ग्रेडों में विशेष रूप से समूह घ में अनुबंध पर और नैमितिक रूप में बड़ी संख्या में महिलाएं कार्य कर रही है। समिति ने य कहकर सरकार के श्रम व्यवहार को कठघरे में खड़ा कर दिया है कि कैाुअल कर्मचारियों को स्थायी प्रति की नौकरियों पर रखा जाता है जो कि अनुचित हैं। लकिन यह केवल नियमों का पालन न करने भर का मामला नहीं है। दरअसल कोई संगठन या सरकार नियमों से ज्यादा सामाजिक रूप से वर्चस्व रखने वाले विचारों और संस्कृति से संचालित होती हैं।

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  • Web Title: प्रसार भारती में महिलाएं