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कागजों में ही सिमट जाती है इनाम की धनराशि

संगीन वारदातों के खुलासे पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नगद इनाम की घोषणाओं की झड़ी लगा देते हैं। पर ये घोषणाएं कागजों यानि पुलिसकर्मियों की सेवा पंजिका में ही दर्ज होकर रह जाती हैं। नगद धनराशि तो राज्य गठन से लेकर अब तक किसी पुलिसकर्मी के खाते में गई ही नहीं है। पुलिस वाले अफसरों के आगे मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा सकते, सो इसे ही नियति मान लिया है। बस वे इस बात से ही खुश हो लेते हैं, कि चलो उनका नाम सेवा पंजिका में दर्ज हो रहा है और प्रोन्नति के समय इसका लाभ मिलेगा।

वर्ष 2009 में 14 मर्डर केस की गुत्थी सुलझाने पर पुलिसकर्मियों पर नगद इनाम की बौक्षार हुई। आला अफसरान ने वारदात के खुलासे के साथ ही पुलिस टीम की पीठ थपथपाई और नगद इनाम देने का भी खूब प्रचार किया। डीजीपी, आईजी से लेकर एसएसपी तक नगद इनाम की घोषणा करने से नहीं चूके, लेकिन एक भी पुलिसकर्मी के खाते में यह इनाम राशि जमा नहीं हुई।

नाम न छापने की शर्त पर पुलिसकर्मी स्वीकार करते हैं कि अनुशासन के दायरे में रहने के कारण वे लोग महकमे के अफसरों के सामने जाकर इनाम की धनराशि मांगने की हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं। पुलिसकर्मी कहते है कि इनाम की धनराशि उन्हें नहीं मिलती है, यह कड़वा सच है। पुलिसकर्मियों ने यह जरूर स्वीकार किया कि उन्हें इस बात की खुशी रहती है कि आला अफसर उनकी सेवा पंजिका में इसे दर्ज कराने में कोई टीका-टिप्पणी नहीं करते हैं।

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