DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मुद्रास्फीति चिन्ता का विषय नहीं, जारी रहेंगे प्रोत्साहनः प्रणव

मुद्रास्फीति चिन्ता का विषय नहीं, जारी रहेंगे प्रोत्साहनः प्रणव

सरकार ने मंगलवार को कहा कि मुद्रास्फीति को लेकर तत्काल बड़ी चिन्ता की जरूरत नहीं है और जब तक अर्थव्यवस्था मंदी के प्रभावों से पूरी तरह उबर नहीं जाती, राजकोषीय प्रोत्साहन उपाय जारी रहेंगे।
   
वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने यहां आर्थिक संपादकों के सम्मेलन का उदघाटन करते हुए कहा कि इस समय मैं यही कहूंगा कि राजकोषीय प्रोत्साहन जारी रहेगा ताकि अर्थव्यवस्था को इसका पूरा फायदा मिल सके।
   
मुखर्जी ने प्रोत्साहन पैकेज जारी रखने की यह टिप्पणी ऐसे समय की है, जब कुछ दिन पहले 27 अक्टूबर को भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति की दूसरी तिमाही की समीक्षा में ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने के बावजूद ऋण को मंहगा करने के कुछ उपाय किये और रिजर्व बैंक के गवर्नर ने उसे प्रोत्साहन पैकेज से हटने का पहला कदम बताया था। वित्त मंत्री ने कहा कि राजकोषीय संतुलन की ओर लौटना बहुत जरूरी है और अर्थव्यवस्था में जैसे ही सुधार हुआ, उस दिशा में कदम उठाया जाएगा।
   
उन्होंने कहा कि सरकार गैर योजना व्यय में कटौती के कदमों पर नजदीकी निगाह रखे हुए है विशेष तौर पर उसकी नजर पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी पर है। चालू वित्त वर्ष में अकेले उर्वरक सब्सिडी 55, 000 करोड़ रूपये रहने का अनुमान है।
   
मुखर्जी ने कहा कि विनिवेश के जरिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने से सरकार को राजकोषीय स्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि राजकोषीय घाटा 2008-09 के दौरान चढ़ना शुरू हुआ और 2009-10 में भी वह कई प्रोत्साहन पैकेजों के साये में है।

मुद्रास्फीति हालांकि अब बढ़नी शुरू हो गयी है और रिजर्व बैंक ने मार्च अंत तक इसके 6.5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान लगाया है लेकिन मुखर्जी ने कहा कि अर्थव्यवस्था में नकदी की कमी नहीं है और मुद्रास्फीति चिन्ता की बड़ी वजह नहीं है।
   
उन्होंने कहा कि सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती देश को
8.5 प्रतिशत से नौ प्रतिशत या उससे अधिक की विकास दर के रास्ते पर लाने की है और यह सुनिश्चित करना है कि यह अगले कुछ दशकों तक जारी रहे।
  
वित्त मंत्री ने कहा कि हमारे लिये अच्छी आर्थिक विकास दर बहुत जरूरी है लेकिन इससे आय बढ़ने के साथ-साथ सरकार के पास विकास के संसाधन बढ़ते हैं और वह आबादी के कमजोर तबके के लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों पर खर्च बढ़ा सकती है।
   
मुखर्जी ने कहा कि दूसरी चुनौती सरकार में नयी ऊर्जा फूंकना और शासन व्यवस्था को मजबूत करना है ताकि लोगों को सार्वजनिक सेवाएं, सुरक्षा और कानून व्यवस्था देने वाली मशीनरी अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनायी जा सके। उन्होंने कहा कि तीसरी चुनौती समावेशी विकास को और व्यापक बनाने की है। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि सभी को खाना, स्वास्थ्य और शिक्षा मिले।

वित्त मंत्री ने कहा कि हाल के महीनों में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। 2009-10 की पहली तिमाही में विकास दर 6.1 प्रतिशत रही जबकि इससे पहले की दो तिमाहियों में यह 5.8 प्रतिशत थी।

वित्त मंत्री ने कहा कि औद्योगिक वृद्धि दर भी जून-जुलाई में काफी सुधरी है और इन महीनों में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक जून और जुलाई में क्रमश: 8.2 और 7.2 प्रतिशत पर रहा। अगस्त 2009 में औद्योगिक वृद्धि दर 10.4 प्रतिशत रही।

प्रणव मुखर्जी ने कहा कि इससे बड़ी बात यह है कि पिछले साल जो विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से पूंजी निकाल रहे थे, वे फिर बाजार में लौट आये हैं और पिछले पांच महीनों में उनका निवेश बढ़ा है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में रिण के लिए संसाधनों की कमी नहीं है और मुद्रास्फीति भी बड़ी चिन्ता का विषय नहीं है।
   
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में औद्योगिक वृद्धि दर में तेजी दिखने के बावजूद सितंबर 2009 में बुनियादी उद्योगों की वद्धि दर नरमी के संकेत दिखे हैं। इसके साथ साथ विश्व अर्थव्यवस्था के मंदी से उबरने की प्रक्रिया को लेकर भी अनिश्चितता है इसलिए हम लोग अपनी सतर्कता को ढीला नहीं छोड़ सकते।

मुखर्जी ने कहा कि नौ प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर हासिल करना विश्व अर्थव्यवस्था के उबरने पर निर्भर करती है क्योंकि 60 प्रतिशत निर्यात विकसित देशों को होता है और हम तत्काल उन बाजारों का विकल्प नहीं निकाल सकते। वित्त मंत्री ने कहा कि घरेलू स्तर पर भी कुछ प्रतिकूल कारक हैं, जिनमें देश के कुछ हिस्सों में मानसून की विफलता, बाढ़ शामिल हैं लेकिन ये कारक अल्पकालिक हैं।

आर्थिक वृद्धि दर के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक के आकलन के अनुसार इसके 2008-09 के 6.7 प्रतिशत के स्तर से घटकर छह प्रतिशत तक रहने की संभावना है। ऋण के कम उठान पर चिन्ता व्यक्त करते हुए मुखर्जी ने कहा कि बैंकों से कहा गया है कि वे आने वाले व्यस्त सीजन का फायदा उठाकर अर्थव्यवस्था के जरूरतमंद क्षेत्रों को पर्याप्त ऋण मुहैया करायें। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं कि रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्रों विशेषकर कृषि, लघु एवं मध्यम उद्यमों का ऋण उठान बढ़े।

मुखर्जी ने सरकार के विशाल राजकोषीय घाटे और उसे भरने के लिए बाजार ऋण कार्यक्रम को लेकर व्याप्त आशंकाओं को खास तवज्जो नहीं देते हुए कहा कि इन सबके बावजूद भारत में ऋण सस्ता बना हुआ है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:मुद्रास्फीति चिन्ता का विषय नहीं, जारी रहेंगे प्रोत्साहनः प्रणव