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पीपीपी के बदले तेवर से जरदारी की बढ़ी मुश्किल

पीपीपी के बदले तेवर से जरदारी की बढ़ी मुश्किल

बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते पाकिस्तान में सत्तारूढ़ पीपीपी ने उस विवादास्पद कानून पर संसद की मुहर लगाने का इरादा त्याग दिया है, जिसके तहत राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले समाप्त किए गए थे। पीपीपी के बदले रुख के बाद जरदारी के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

जरदारी और प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की अध्यक्षता में पीपीपी के वरिष्ठ नेताओं की एक बैठक होने के बाद पार्टी ने सोमवार रात ऐलान किया कि वह संसद से नेशनल रीकौन्सिलिएशन ऑर्डिनेन्स (एनआरओ) को मंजूरी देने के लिए नहीं कहेगी।

एनआरओ वर्ष 2007 में तत्कालीन सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने जारी किया था, जिसके तहत पीपीपी नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले समाप्त किए गए थे। राष्ट्रपति की प्रवक्ता फरहतुल्ला बाबर ने कहा कि बैठक में तय किया गया कि एनआरओ को संसद में पेश नहीं किया जाएगा।

बैठक में गिलानी ने संसद का मत पेश किया। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रणाली को बचाने और आम सहमति तथा सुलह सहमति की वर्तमान नीति जारी रखने का संकल्प जताया। इससे पहले पीपीपी की सहयोगी मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के कुछ नेताओं ने कहा था कि उनकी पार्टी के प्रमुख अल्ताफ हुसैन ने जरदारी को लोकतंत्र बचाने के लिए इस्तीफा देने की सलाह दी थी।


मुख्य विपक्षी पीएमएल (एन) के प्रमुख नवाज शरीफ ने धमकी दी थी कि अगर एनआरओ को संसद की मंजूरी मिली तो वह देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे। एमक्यूएम के प्रमुख हुसैन ने प्रत्यक्षत: पीपीपी के दबाव के कारण अपना इरादा बदला लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था।

उन्होंने कहा कि उन्होंने जरदारी को इस्तीफे की सलाह नहीं दी थी। उन्होंने कहा कि एमक्यूएम जनता की इच्छा के अनुरूप एनआरओ पर फैसला करेगी। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा 31 जुलाई को दिए गए आदेश के अनुसार, एनआरओ को चार माह में संसद की मंजूरी लेना होगा।

मुशर्रफ ने एनआरओ यह सुनिश्चित करने के लिए जारी किया था कि पीपीपी अक्तूबर 2007 में हुए राष्ट्रपति पद के चुनावों का बहिष्कार न करे। मुशर्रफ सेना प्रमुख के पद से इस्तीफा दिए बिना दोबारा इन चुनावों में राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।

अगर एनआरओ को तय समय में संसद की मंजूरी न मिली तो यह निरस्त हो जाएगा और फिर, इसके तहत समाप्त किए गए भ्रष्टाचार के मामलों को दोबारा खोला जा सकता है। प्रमुख अधविक्ता और पीपीपी के वरिष्ठ नेता ऐतजाज अहसान ने कहा कि अगर इसे संसद की मंजूरी न मिली तो कानून निरस्त हो जाएगा।

पीएमएल (एन) लगातार एनआरओ का विरोध कर रही है। इस कानून से उसे कोई फायदा नहीं हुआ है।

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