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दो टूक (03 नवंबर, 2009)

गढ़मुक्तेश्वर से लेकर वाराणसी तक सभी नदियों ने कार्तिक पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं के पाप धोए और लोगों ने पुण्य कमाए। लेकिन इससे हमारी नदियों को क्या मिला? शायद थोड़ा और मैलापन। खोखले ही सही, शासन-प्रशासन को रह-रह कर नदियों की फिक्र के दौरे पड़ते तो हैं। पर हमें?

हम तो उन अरबों रुपयों के खर्च की पहरेदारी भी न कर पाए जो नदियों की सफाई के नाम पर न जाने  कहां बिला गए? जाहिर है हमारी नदियां तब तक निर्मल नहीं होंगी जब तक उस काम में सबका सीधा और सक्रिय हस्तक्षेप नहीं होगा। सिर्फ पर्वो-मेलों पर उन्हें याद करने से क्या फायदा? काश, पूजा-आस्था के अनुष्ठानों के साथ नदियों की सफाई के संकल्प के भी दो-चार अर्घ्य होते!

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  • Web Title:दो टूक (03 नवंबर, 2009)