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शिक्षक नहीं मिले, विधि कॉलेज में शून्य-सत्र तय

प्रदेश के एकमात्र राजकीय विधि महाविद्यालय गोपेश्वर में इस सत्र में प्रवेश की संभावना खत्म हो गई है। इस कॉलेज के लिए सरकार आठ शिक्षकों का इंतजाम नहीं कर पाई। मौजूदा सत्र में शिक्षकों की संख्या दो से घटकर एक रह गई है। तिवारी सरकार के कार्यकाल में गोपेश्वर में स्थापित किया गया राजकीय विधि महाविद्यालय बंदी के कगार पर पहुंच गया है।

कॉलेज में इस सत्र में प्रवेश के लिए बार कौंसिल ऑफ इंडिया की अनुमति मिलने की संभावना खत्म हो गई है। कौंसिल के मानकों के लिहाज से कॉलेज में प्राचार्य के अलावा न्यूनतम आठ शिक्षक जरूरी हैं। रोचक बात यह है कि इस कॉलेज के लिए सरकार ने महज चार पद सृजित किए हैं। इन पदों पर एक नियमित और दो संविदा शिक्षक रखे गए। नियमित शिक्षक का बरसों से कुछ पता नहीं है जबकि संविदा शिक्षकों में एक को दूसरी जगह बेहतर विकल्प मिल गया है।

इस तरह कॉलेज में एक प्राचार्य और एक शिक्षक कार्यरत हैं। बीते महीनों में शासन स्तर पर दो बार बैठकों के बावजूद कॉलेज के लिए आठ शिक्षकों का इंतजाम नहीं हो सका। दूसरी बड़ी दिक्कत यह हुई कि केंद्रीय बनने के बाद गढ़वाल विवि ने भी हाथ खींच लिए। इस कॉलेज में सत्र के शून्य होने का खामियाजा उन छात्र-छात्रओं को भुगतना पड़ेगा जो दून, हरिद्वार के निजी कॉलेजों में महंगी फीस देकर लॉ की पढ़ाई नहीं कर सकते।

इस बारे में उच्च शिक्षा ओएसडी आरके सिंह का कहना है कि विधि कॉलेज का मामला सरकार की जानकारी में है। शिक्षकों की उपलब्धता में कुछ तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं। इन्हें दूर करने में थोड़ा समय लग सकता है। शून्य सत्र के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकते।

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