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भारत को लड़ना ही होगा आंतरिक युद्ध

आजकल कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजर रहा है, जब माओवादी घटनाएं राष्ट्रीय खबर न बनें। माओवादी लगातार ताकतवर हो रहे हैं और भारतीय राज्य तब भी निष्क्रिय बना रहता है, जब उसके अपने संस्थान निशाने पर होते हैं। पश्चिम बंगाल के संकरैल थाने के ऑफिसर इंचार्ज अतींद्रनाथ दत्त का जिस प्रकार अपहरण हुआ और उन्हें 55 घंटे बंधक रखने के बाद माओवादी नेता किशनजी ने यह कहते हुए रिहा किया कि यह माओवादियों द्वारा ‘युद्धबंदी रिहा किए जाने का पहला मामला’ है, वह इसका प्रमाण है।

दत्त की रिहाई तब हुई, जब सरकार ने 22 नक्सलियों की जमानत का विरोध न कर उन्हें रिहा हो जाने दिया। पश्चिम बंगाल सरकार ने इस रिहाई के लिए किसी तरह के सौदे से इनकार किया, पर जब आलोचना शुरू हुई तो उसने इसकी तुलना 1989 में रुबय्या सईद और 1999 में कंधार विमान अपहरण से कर डाली। बाद में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव ने भी माना कि सरकार को झुकना पड़ा।

भारत सरकार पिछले कुछ समय से माओवादियों को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बता रही है। फिर भी उसकी नीतिगत तैयारी उस टक्कर की नहीं लगती। संप्रग सरकार अपने पहले कार्यकाल में नक्सली खतरे को पहचान ही नहीं सकी। नतीजतन उसकी प्रतिक्रिया इनकार, समायोजन और उपेक्षा की रही है। वामपंथी दलों जैसे सहयोगी और शिवराज पाटिल जैसे निष्प्रभावी गृहमंत्री के होते हुए सरकार ने स्थिति को और बिगड़ जाने दिया। इस बीच माओवादियों का लाल गलियारा फैलता गया। कई वर्षो से नक्सली सुरक्षा बलों और नागरिकों को लगातार क्रूरतापूर्वक मार रहे हैं और भारतीय राज्य उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। जबकि सेलिब्रिटी कार्यकर्ता किसी न किसी नैतिक आधार पर उनके कामों को सही ठहरा रहे हैं।

केंद्र सरकार की तरफ से किसी रणनीति के अभाव में राज्यों ने अपने तरीके से निपटने की पहल की। उन्होंने जहां माफी देने का कार्यक्रम शुरू किया, वहीं सलवा जुडूम जैसी सशस्त्र मिलिशिया का गठन भी किया। संप्रग सरकार को अपने दूसरे कार्यकाल में जब महसूस हुआ कि स्थिति हाथ से निकल चुकी है तो उसने उसका सामना करने के बारे में सोचा। इन्हीं स्थितियों में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने संसद में माना कि पिछले कुछ वर्षो से माओवादियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा की जो चुनौती प्रस्तुत की उसे हम कम करके आंक रहे थे।

नक्सलवाद से निपटने के बारे में भारतीय बुद्धिजीवियों में जो पारंपरिक विवेक है, उसके अनुसार यह महज सामाजिक-आर्थिक समस्या है। अगर हम भटके हुए युवाओं को नौकरी दे दें तो माओवाद को फैलने से रोक सकते हैं। यह धारणा सरकार के उस विकास पैकेज का आधार है, जो नक्सली इलाकों के लिए तैयार किया गया है और सरकार का मानना है कि इससे उनको मुख्यधारा में लाने में मदद मिलेगी। माना जाता है कि विकास और सुशासन देश के कुछ इलाकों के हिस्से चला गया और जहां इसका खालीपन बचा, वहीं नक्सलियों ने राज्य की वैधता की जगह ले ली।

निस्संदेह नक्सलवाद से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है और इसका एक आयाम यह भी है कि विकास संबंधी अनुदान समाज के निचले तबके तक छन कर जाए। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि नक्सलियों को सेना के स्तर पर पराजित करने के काम को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। लंबे समय से इन शक्तियों से लड़ने के प्रति ढुलमुल रवैया रहा है। माओवादियों के वामपंथी दावों के प्रति एक बकवास किस्म की भावुकता भी रही है। तर्क दिया जाता रहा है कि यह आदर्शवादी और अच्छे इरादों के लोग हैं, जो भटक गए हैं लेकिन जल्दी ही उन्हें सहभागी लोकतंत्र का अर्थ समझ में आ जाएगा और वे देश की चुनाव प्रक्रिया में शामिल हो जाएंगे।

कांग्रेस पार्टी जाने क्यों नक्सलियों पर कार्रवाई में संकोच दिखा रही है, जबकि वह जम्मू और कश्मीर और पूवरेत्तर राज्यों में आंतरिक सुरक्षा से निपटने में मुस्तैद रही है। गृहमंत्री कह रहे हैं कि वामपंथी उग्रवाद ने देश के 20 राज्यों के 223 जिलों के 2,000 पुलिस थानों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। उन्होंने यह भी बताया है कि सन 2008 के दौरान नक्सली हिंसा की 1951 घटनाएं हुई हैं, जिनमें 721 लोग मार गए हैं। इस साल के अगस्त महीने तक मारे जाने वालों की संख्या 580 तक पहुंच गई थी। इसके बावजूद माना जाता रहा है कि उनका मकसद सही है, पर उसके लिए वे जो साधन इस्तेमाल कर रहे हैं, वह थोड़ा कठोर है।

हालांकि माओवादियों ने यह बार-बार स्पष्ट किया है कि वे भारतीय राज्य का विखंडन चाहते हैं और अपने इस उद्देश्य के लिए वे स्थानीय लोगों की समस्याओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय बौद्धिक वर्ग और भारत सरकार को माओवादियों से किसी प्रकार का समझौता करने से बचना चाहिए। माओवादी कह रहे हैं कि वे बातचीत तभी करेंगे, जब उनके इलाके से सारे सुरक्षा बल वापस बुला लिए जाएं, सारे माओवादी छोड़ दिए जाएं और उनके हथियार डालने को शर्त न बनाया जाए। उनका अतिवादी लक्ष्य और उनके तरीकों की अति उन्हें भारतीय राज्य के सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में प्रस्तुत करते हैं।  इस समय सरकार के सामने असली काम लोकतंत्र विरोधी नक्सली ताकतों को सेना के स्तर पर पराजित करना है।

भारत सरकार को भागीदारी की राजनीतिक प्रक्रिया और विकास का एजेंडा लागू करने के लिए स्थितियां पैदा करनी होंगी, तभी उसका प्राधिकार स्थापित होगा। हाल की घटनाओं से यह स्पष्ट है कि भारत के अर्धसैनिक बल और पुलिस बल लगातार नाकाम हो रहे हैं। उपयुक्त संख्या और उचित प्रशिक्षण के बिना भारतीय पुलिस माओवादियों का सामना करने से झिझक रही है और स्थानीय आबादी को उन्हें चुनौती देने में ज्यादा ही मुश्किल पेश आ रही है।

इस सिलसिले मे हालांकि हाल में नक्सलियों के खिलाफ शुरू किया गया ऑपरेशन ग्रीन हंट सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन माओवादी कार्यकर्ताओं का सफाया करने के बाद प्रशासन को अपना ढांचा तेजी से बनाना होगा।

माओवादी भारतीय लोकतंत्र की जिस अवधारणा और अस्तित्व के खिलाफ लड़ रहे हैं, उसमें आदिवासी और किसान शामिल हैं। हालांकि माओवादी उन्हीं के मकसद की लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे हैं। माओवादी मकसद में रूमानियत देखना खतरनाक है। भारतीय लोकतंत्र और उसके विकास के मॉडल की सीमाएं स्वीकार करना तो ठीक है, पर उसकी और ज्यादा लोगों को अपने भीतर समाहित करने की क्षमताओं के बारे में किसी तरह के प्रायश्चित की कोई जरू रत नहीं है। दरअसल विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा माओवादी हिंसा ही है।  

harsh.pant@kcl.ac.uk

लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं

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