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कश्मीर : विकास नहीं है विरोध की इस राह में

उस दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह श्रीनगर से काजीगुंड के बीच रेल लाइन सेवा शुरू करने राज्य के दौरे पर पहुंचे तो श्रीनगर में मुर्दनी छायी थी। हार्डलाइनर सैयद अली शाह गिलानी ने बंद का ऐलान किया था। इसलिए दुकानें बाजार सब बंद थे। गिलानी जी को क्या चाहिये, ये शायद उनको भी नहीं मालूम। विकास नहीं चाहिये। केन्द्र सरकार से फाइनेन्शियल पैकेज से भी वो खुश नहीं होते। चुनावों का बहिष्कार करते हैं। ये अलग बात है कि उनके इस फैसले के बावजूद घाटी के 70 फीसदी लोग वोट डालने निकलते हैं।
 
केन्द्र सरकार बातचीत का न्योता दे तो वे उस पर मीन-मेख निकाल कर बातचीत के आगाज में ही बाधा डाल देते हैं। यानी साल के 365 दिन कुल मिलाकर वो ये करते हैं कि किस तरह से कश्मीर और कश्मीर के लोग मेनस्ट्रीम यानी मुख्य धारा से कटे रहें। क्योंकि कश्मीर में भी दूसरे कुछ विकासशील राज्यों की तरह विकास की रफ्तार बढ़ी, ज्यादा से ज्यादा लोग नयी टेक्नोलॉजी से रू-ब-रू हुए, लोगों में भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा बढ़ी तो गिलानी को डर है, कहीं उनको अपना बोरिया बिस्तर न समेटना पड़े। इसलिए कश्मीर की आवाम को कूपमंडूक बनाये रखने में ही उनका वेस्टेड इंटरेस्ट रहता है।

पिछले लगभग दो दशकों में केन्द्र में किसी भी पार्टी या गठबंधन की सरकार रही, उसने आतंकवाद के बावजूद कश्मीर पर काफी तवज्जो दी। चाहे श्रीनगर में किसी भी पार्टी की सत्ता रही हो। नेशनल कॉन्फ्रेन्स की या पीडीपी की या फिर कांग्रेस की।

अब तक हजारों करोड़ रुपये का पैकेज का ऐलान किया और विकास के कई प्रोजेक्ट शुरू भी किए। बारामूला से श्रीनगर और फिर कटरा, ऊधमपुर होते हुए जम्मू तक नयी रेल लाइन बिछाने का ऐसा व्यापक काम शुरू किया। देश के किसी भी हिस्से में इतना चैलेंजिंग प्रोजेक्ट शायद कहीं नहीं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इस प्रोजेक्ट ने हौले-हौले रफ्तार पकड़ी है।

देश के कई ऐसे राज्य भी हैं, जहां जिस गति से विकास होना चाहिये था, आजादी के साठ साल बाद भी नहीं हुआ। गिलानी साहब ने बीमारू राज्यों के बारे में जरूर सुना ही होगा। उन्हें पता होना चाहिये कि उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान और मध्य प्रदेश ऐसे कई राज्य हैं, जहां लोग विकास के लिये छटपटा रहे हैं। स्कूलों के खस्ता हाल से परेशान हैं। बिजली, पानी सड़क जैसी जरूरी सुविधाओं से महरूम हैं। लेकिन ऐसे राज्यों में भी अब बदलाव की बयार बह निकली है।

अवाम ऐसी सरकार ही चुन रही है, जो केवल विकास सोचे और उनके लिये विकास करे। गिलानी साहब और हुर्रियत के उनके तमाम हार्डलाइनर साथियों को ये बताना भी जरूरी होगा कि अगर कश्मीर में फौज मानवाधिकार का हनन करती है, लोगों को बेवजह सताती है तो देश के दूसरे राज्यों में पुलिस प्रशासन पर भी ऐसे तमाम आरोप लगते हैं।
कश्मीर का दर्जा अलग है कि रट लगा कर कब तक देश और कश्मीर के चौतरफा विकास के बीच दीवार बने रहेंगे। गिलानी साहब कभी ये नहीं कहते कि कश्मीर की कश्मीरियत खो गयी है। उसे दोबारा जिलाना जरूरी है। जो लोग कश्मीर में घर बार छोड़कर देश के दूसरे हिस्सों में विस्थापितों की जिंदगी बसर कर रहे हैं, उन्हें वापस घर बुलाना होगा। सरकार और राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर वो माहौल तैयार करना होगा, ताकि विस्थापितों में असुरक्षा की भावना खत्म हो।

अब तो कश्मीर की आवाम भी बदलाव चाहता है। नौजवान पीढ़ी के पास बहुत से सपने हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भारी मात्र में वोट डालकर उन्होंने अपने इरादों का अहसास करा दिया। कश्मीर का किसान अब सेब की खेती करता है तो बल्गेरिया से उसके बीज मंगा रहा, क्योंकि इसमें फल जल्दी आ जाते हैं।

बंदूक छोड़कर कश्मीरी युवक के कदम इंटरनेट कैफे की तरफ बढ़ रहे हैं। जहां कभी फोन लाइन भी ठीक से काम नहीं करती थीं वहां का व्यापारी, स्टूडेन्ट, पढ़ा-लिखा तबका दुनिया भर से कनेक्ट हो रहा। काजी तौकीर जैसे गायक अब मुंबई के मंच से पूरे हिंदुस्तान को अपनी आवाज का जादू दिखाने को बेताब हैं। अभी तीन महीने पहले जब भारतीय वायु सेना ने श्रीनगर में रिक्रूटमेंट कैंप लगाया तो हजारों युवक कैंप में फिजिकल टेस्ट के लिये घाटी के कोने-कोने से पहुंचे।

जैसे-जैसे दिल्ली अपने इरादों को मून टच देगा और कश्मीर में दिमाग और दिल दोनों लगाएगा, वैसे-वैसे गिलानी सरीखे शख्स को दरकिनार करने में उसे मदद मिलेगी। तब विशेष दर्जे के बावजूद जमीनी हकीकत में भी जम्मू-कश्मीर मिसाल कायम करेगा। जिसके विकास और मिजाज को देखकर देश के दूसरे राज्यों को रश्क होगा।

लेखक टीवी पत्रकार हैं

prabhat.shunglu@network18online.com

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