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नई संस्कृति के खतरे

आज का जीवन विज्ञान के वरदानों के सहारे चल रहा है। सुख-सुविधाओं की बात हो या ज्ञान की, बस एक बटन दबाने से पल भर में, सब सामने आ जाता है। मोबाइल और कंप्यूटर अनेक बार सुरक्षा के माध्यम बनते हैं। मुसीबत में इन्हीं की मदद से राहत मिल सकती है। दूसरी ओर हमारे व्यक्तिगत जीवन पर रात-बिरात, मौका-बेमौका, चौबीस घंटे मोबाइल जैसे यंत्र अपना दावा पेश करते रहते हैं।

मोबाइल की सभ्यता का विकृत रूप सभाओं में, गोष्ठियों में, अक्सर दिखता है। सभा के शुरू में ही उसे बंद रखने का अनुरोध किया जाता है। फिर भी हॉल में कभी हनुमान चालीसा, कभी गायत्री मंच या फिर फिल्मों के हिट गानों के मुखड़े सुनाई पड़ते रहते हैं। जब तक पर्स के कुएं में से या जेबों में टटोल कर मोबाइल हाथ में आता है, तब तक वक्ता-श्रोता सभी विचलित रहते हैं।

बस हो, मेट्रो हो या किसी का घर हो- पंचम स्वर में बात करते हुए लोग ऑर्डर बुक करने से लेकर डिलीवरी तक का कारोबार कर डालते हैं। क्रेडिट कार्ड, लोन, जीवन बीमा आदि जबरदस्ती झोली में डालने की कोशिश करती कम्पनियों से बचते-बचते कई बार जरूरी फोन भी सुन नहीं पाते। कानों पर हेडफोन लगाए समाधि में लीन युवक-युवतियां अक्सर दिखाई पड़ती हैं। एकालाप करते हुए लोग दीवाने से लगते हें। यह खिलौना, ओढ़ना-बिछौना हुआ जा रहा है। इंटरनेट पर फेसबुक के जरिए दुनियाभर में फैले हुए, भूले-बिसरे बचपन के दोस्तों से, रिश्तेदारों से नाते जुड़ जाते हैं। आत्मकेन्द्रित समाज में यह दृश्य उम्मीदें जगा रहा है।

इसी चेहरे की किताब के पृष्ठ बरसों से मानस की अतल गहराइयों में दबी ढकी शिकायतों के मंच भी बन रहे हैं। कई मन घायल हो जाते हैं। राहत पाने की जगह आहत हो जाते हैं। ब्लॉगिंग संवाद और अभिव्यक्ति का साधन भी बन रही है, तो चरित्रहनन का भी। ‘ट्विटर्स’ में चहचहाते लोग परेशानियों को दावत दे देते हैं। इससे विवेक और संवेदना बढ़नी चाहिए थी, लेकिन लोग विवेकहीन और संवेदनशून्य हो रहे हैं।

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