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संन्यास के लक्षण

मैंने उनसे जानना चाहा, ‘कितने सारे खिलाड़ियों ने अपने खेलों को अलविदा कह दिया। कितने सारे कलाकारों ने अपनी कलाकारियों का परित्याग कर दिया। तमाम नामी गिरामी हस्तियां कब का संन्यास ले चुकीं। कुछेक अघा चुकने के पश्चात लाइन में हैं। आप भी तो अपनी पार्टी में सीनियर समङो जाते हैं! कब लेने की सोच रहे हैं?’
   
इतना सुनना था कि पार्टी की आपातकालीन बैठक के नाम पर निकल रहे उनके चरण-वाहन सहसा ठिठक-से गए। वे मुझे दुर्वासा दृष्टि से घूरते हुए बोले, ‘काहे का संन्यास! तुम कहो तो दो-चार गृहस्थ जीवन यहीं खड़े-खड़े भोग लूं। संन्यासी बनके अपनी मार्केट खराब करानी है क्या? देख नहीं रहे, साधु-संन्यासियों की कैसी दुर्गति हो ली? आतंकवाद का ठप्पा लगा। नारको टेस्ट और ब्रेन मैपिंग हुई। अपने राम तो इस सत्ता की राजनीति में ही खुश हैं, जहां पर न रिटायरमेंट की कोई उमर, न ही खाने-खिलाने की कोई लिमिट। जब जैसी मर्जी हो वैसी बयानबाजी करो, फिर अपने ही कहे की पलट मार के उल्टा खड़े हो जाओ। विपक्षी चिल्लाते रहें, तुम सुनो ही नहीं!’

‘लेकिन सुना तो यह जा रहा था कि आप पिछले विधानसभा चुनावों के फौरन बाद ही सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करने वाले थे!’ मैं उन्हें महीन तरीके से छेड़ता हुआ बोला। उनका पलस्तर भीतर से उखड़ लिया, ‘तुम्हें कुछ पता भी है! संन्यास जैसी बातें पराजित प्रत्याशियों को शोभा देती हैं। देखो बच्चा, संन्यासी की खोपड़ी घुटी मिलती है। वह नंगे पांव रहता है। मेरे में तुमको ऐसे कोई लक्षण प्रकट होते दिखलाई पड़ रहे हैं क्या?’

मेरे मन में आया कि कह ही दूं, जनाबेआली, आप से बढ़के घुटा हुआ आदमी इस पूरे एरिया में नहीं मिलेगा। और पांवों के नंगेपन की तो बात ही दीगर है, आप तो साष्टांग नंगे हैं। मगर अपनी सलामती किसको प्यारी नहीं होती, इस नाते मैं खामोश रहा।

वे मुस्की मारते हुए बोले, ‘ये संन्यास-वंन्यास सब बेकार के चोचले हैं। मैं तो आजीवन न लूं। मेरी इन चारों आश्रमों में से सिर्फ वानप्रस्थ आश्रम में थोड़ी-बहुत श्रद्घा है। वजह ये कि अपने संपूर्ण पोलिटिकल करियर में मार्ग दर्शन के नाम पर मैंने अपने विरोधियों को जंगल की राह दिखलाई है। जो गया, वह आज तक वापस नहीं आया।’

मैंने पूछा, ‘और ब्रह्मचर्य आश्रम के बारे में आपके क्या सुविचार हैं?’ उन्होंने उलटा मुझ पर ही सवाल दाग दिया, ‘यह किस चिड़िया का नाम है?’ इससे पहले कि ‘राजनीति में गृहस्थ आश्रम की उपादेयता’ पर अपना लेर वे मुझे पिलाते, मैंने चर्चा से ही अपना इस्तीफा उन्हें सौंप दिया, और धीरे से चलता बना।

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