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कोड़ा की संपदा

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की देश और दुनिया में फैली करीब दो हजार करोड़ की बेहिसाब संपत्ति उजागर होने से सबकी आंखें फटी सी रह गई हैं। भ्रष्टाचार के इस वैश्वीकरण ने जहां लूट के कारण स्थानीय नागरिकों की बदहाली की वजह स्पष्ट की है, वहीं उदारीकरण की प्रक्रिया को अच्छी तरह से चलाने के लिए कड़ी निगरानी की जरूरत भी जताई है। हालांकि जांच जारी है और अभी से निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते, पर एक गरीब और पिछड़े राज्य का एक बार मुख्यमंत्री होने और इतनी संपत्ति अर्जन से जुड़े सवाल उठने लगे हैं।

सवाल यह भी है कि क्या किसी बड़ी पार्टी के साथ न होने और सत्ता से बाहर होने के कारण ही कोड़ा का मामला उजागर हो पाया है और क्या वे देर-सबेर कहीं पनाह लेकर इससे बच सकते हैं? इस बीच भ्रष्टाचार के पिछड़े, दलित और आदिवासी आयामों पर सवाल उठाने वाले सब-आल्टर्न व्याख्याकार भी खड़े हो जाते हैं। उनका कहना होता है कि आखिर क्यों भ्रष्टाचार में समाज के वंचित वर्ग के लोग ही फंसते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार में सामाजिक न्याय का तर्क लाने वाला यह विमर्श दरअसल लूट में हिस्सेदारी का तर्क है और यह दलील आखिरकार समाज के उसी पिछड़े और वंचित वर्ग को नुकसान पहुंचाती है, जिसके लिए सारा सामाजिक न्याय का दर्शन गढ़ा जाता है।
   
मधु कोड़ा झारखंड की पहली सरकार में भी खान मंत्री थे और बाद में भी जो सरकारें बनीं, उसमें भी उनके पास यह विभाग बना रहा। यहां तक कि 2006 में जब चंद स्वतंत्र विधायकों के बूते पर वे कांग्रेस, राजद, और शिबू सोरेन की झामुमो का समर्थन हासिल कर एक निर्दलीय मुख्यमंत्री बने, तो भी खान मंत्रलय अपने पास ही रखा। जाहिर है झारखंड जैसे खनिज संपदा संपन्न राज्य में पूंजीपति, राजनेता, अफसर और ठेकेदार सभी की निगाह खदान पर ही रहती है और उसका महत्व कोड़ा ने अच्छी तरह समझ लिया था। तभी उनके सहयोगी संजय चौधरी ने लाइबेरिया में जा कर खदान खरीदी। 

लेकिन मधु कोड़ा के किस्से सन 2005 से ही आने लगे थे और बाद में उन्होंने कहा था कि अगर उनके पास धन न होता तो वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एक दिन नहीं रह सकते। लगता है उन्हें मंत्री और मुख्यमंत्री बनाने में बेहिसाब कमाई करने वालों के हित जुड़े थे। इसलिए यहां मधु कोड़ा के साथ वे दल भी कटघरे में होते हैं, जो समर्थन दे कर जिंदा मक्खी निगलने की गठबंधन की राजनीति कर रहे थे।

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