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युवा नेता क्या यूपी को सुधार सकेंगे

‘हिन्दुस्तान’ के पहले पन्ने पर छपा शशि शेखर जी का उत्तरप्रदेश दशा-दिशा समागम के बारे सम्पादकीय लेख पढ़ा। बहुत अच्छा लगा कि कोई तो है, जो उत्तर प्रदेश के बारे में सोच रहा है! अगले दिन लखनऊ  में हुए इस समागम की चर्चा पढ़ी! सभी पार्टियों के युवा नेता वहां मौजूद थे और डट कर बोले!  क्या यह वास्तव में संभव है कि सभी पार्टियों के युवा नेता एक जुट हो कर उत्तर प्रदेश के सुधार में लगें? या फिर यह एक ख्याली पुलाव बन कर ही रह जाएगा?
ब्रजेश भाटिया अन्तेलोपे रोड, फोर्ट कालिंस , कोलोराडो, अमेरिका

गरीबों की दिल्ली
सरकार ने गरीबों की कमर तोड़ना शुरू कर दिया है। खेलो की आड़ में गरीबों को भगाने की तैयारी शुरू हो चुकी है सब्जी, दाल, रोटी और अब बस का किराया बढ़ चुका है। इसका मतलब साफ है की गरीबों की आफत के दिन शुरू हो चुके हैं।
हरीश चन्द्र खुलबे

लौह पुरुष की विस्मृति
विश्व इतिहास का विलक्षण पुरुष बल्लभ भाई पटेल सच्चे अर्थों में राष्ट्रनायक थे। 562 रियासतों का एकीकरण करके भारत को वर्तमान स्वरूप देना ऐसा काम था जिसे पटेल जैसा लौह पुरुष ही सम्भव बना सकता था। 31 अक्टूबर को समाचार-पत्रों में आयरन लेडी के नाम से विख्यात श्रीमती इन्दिरा गाँधी पर तो बहुत कुछ था, लेकिन लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल के महान् योगदान के अनुरूप उनके बारे में देखने-पढ़ने को नहीं मिला। राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन में पटेल की पराक्रमी भूमिका को भुला देना निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्वाभिमान को ठेस पहुँचने जैसा काम है।
राम निवास ‘गुणग्राहक’, दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

राहुलजी क्या ढूंढ़ रहे है?
युवराज राहुल गांधी के क्रियाकलापों से आम देशवासियों के दिलो-दिमाग में उत्सुकता बनी हुई है। देश के हर क्षेत्र में जाकर कांग्रेस के प्रचार-प्रसार से लेकर गरीब की झोंपड़ी में जाकर उनकी दिक्कतों को नजदीक से देखना तथा आम साधारण देशवासी की तरह गुपचुप ढंग से रेल, मोटर, पैदल (ट्रैकिंग) यात्रा करना। यह शैली आजकल के धनबटोरू-चापलूस भ्रष्ट नेताओं के लिए सिरदर्द बना हुआ है। एक सांसद होने के नाते उनके मन में क्या भावनाएं हैं, यह वही जानें, लेकिन आम जनमानस स्वयं में अवश्य प्रश्न कर रहा है कि राहुलजी आखिर क्या ढूंढ़ रहे हैं?
डॉ. गुलाब सिंह राणा, जखोली

पॉलीथिन फैक्ट्री बंद हो
पर्यावरण को सुन्दर और प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए सरकार भले ही प्रयास कर रही है, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कार्य होता नहीं दिख रहा है। पर्यावरण के लिए पॉलीथिन सबसे बड़ा खतरा है, साथ ही इसका प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। शहर के चारों और पॉलीथिनों के ढेर देखे जा सकते हैं, लेकिन सरकार इसको प्रतिबंधित करने में नाकाम है। सभी खाद्य पदार्थ पॉलीथिन में पैक हो रहे हैं। सरकार को सबसे पहले इन पॉलीथिन को बनाने वाली फैक्ट्रियों को बंद करना चाहिए।
एल.एस.कमल, देहरादून

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