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शिबू और भाजपा के नेता आ सकते हैं निशाने पर

राजनीति में स्थायी कुछ नहीं होता। राष्ट्रपति शासन, चुनावी मौसम और आयकर का वर्तमान छापेमारी अभियान, झारखंड के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए काफी अहमियत रखता है। कांग्रेस अभी काफी महत्वपूर्ण हो गयी है। पार्टी ने अपने तरकश से अंतिम तीर भी निकाल लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और निवर्तमान निर्दलीय विधायकों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय का मनी लांडरिंग केस और फिर छापेमारी से कांग्रेस को अपना रास्ता आसान होता दिख रहा है।

मधु कोड़ा एंड कंपनी  के यहां हुई छापेमारी की सूची में शिबू सोरेन के आप्त सचिव एमएम पाल, लंबे समय तक मुख्य सचिव के सचिव रहे प्रमोद कुमार सिंह के नाम भी शामिल हो जाने से आयकर, प्रवर्तन निदेशालय एवं एजेंसियों का काम बढ़ गया है। एमएम पाल का सूत्र पकड़ शिबू सोरेन और प्रमोद सिंह की आड़ में कई मुख्य सचिव और अन्य आइएएस अधिकारी जांच के लपेटे में आ सकते हैं।

पूर्व के कार्यकलापों के आधार पर भाजपा के एक बड़े नेता पर भी नजरें दौड़ायी जा रही है। टीम प्रमोद कुमार सिंह के रास्ते उन तक भी पहुंचने का सुराग ढूंढ़ रही है। प्रमोद सिंह  पूर्व सीएस एमके मंडल और एके बसु के कार्यकाल में काफी हावी थे। राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद उनके आलमारी से ऐसी कई महत्वपूर्ण फाइल बरामद हुई है, जो सालों से आदेश होने के बाद भी उन्होंने रोक रखी थी।

झारखंड विकास मोरचा को तालमेल का लालच देकर अपने नजदीक लाना और फिर अपनी शर्तो पर उसे झुकाना कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्तमान स्थिति में झाविमो और उसके सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी की छवि प्रभावित हुई है। झारखंड में शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, मधु कोड़ा और अजरुन मुंडा प्रभावशाली नेता माने जाते हैं।

पार्टी के तौर पर झामुमो, राजद, झाविमो और भाजपा का अच्छा-खासा प्रभाव है। कांग्रेस ने साथ लेने की बजाय दूसरे को कमजोर करने की रणनीति पर काम करना शुरू किया है।

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