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दुमका की जनता ने झामुमो की लाज बचायी

दुमका की जनता ने किसी तरह झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन की लाज बचा दी। या यूं कहें कि शिबू की बीमारी की सहानुभूति ने उन्हें विजयी बना दिया। वरना इस बार झामुमो का सुपड़ा साफ था। 15वीं लोकसभा उप चुनाव में यूपीए के सबसे बड़े घटक दल के रूप में झामुमो चुनाव लड़ रहा था, लेकिन चुनाव परिणाम ये संकेत दे रहे हैं कि झारखंड का यह सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल सफाये के करीब है।ड्ढr झामुमो ने 14 में से आठ सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन अपनी चार सीटिंग सीटों में से मात्र एक को बचाने में कामयाब रहा, जबकि पलामू सीट राजद से छीनी, हालांकि यह जीत झामुमो की नहीं, बल्कि कामेश्वर बैठा की है, जिन्हें पलामू में नक्सलियों का पूरा समर्थन मिला। इस चुनाव में झामुमो के आदिवासी-कुरमी वोट बैंक में भाजपा ने जबरदस्त सेंध लगायी है। यह जरूर है कि इस बार झामुमो के खराब प्रदर्शन के पीछे गुरुाी की बीमारी बड़ा कारण है। बीमारी के कारण गुरुाी इस बार कहीं चुनाव प्रचार नहीं कर सके। पार्टी और पारिवारिक अंतर्कलह के कारण झामुमो का कोई भी नेता खेवनहार के रूप में सामने नहीं आ सका। जो भी दूसरी पंक्ित के नेता हैं, वे अपनी सीट ही नहीं बचा सके। स्थिति यहां तक बन आयी कि खुद तो डूबे ही, कहीं-कहीं सहयोगी दल को भी नुकसान पहुंचाया। इसका उदाहरण गोड्डा और हाारीबाग है।ड्ढr 14वीं लोकसभा में झामुमो को चार सीटें मिली थीं और वह यूपीए सरकार में शामिल था। परमाणु समझौते के समय झामुमो अपना महत्व दिखाने में कामयाब रहा था। शिबू सोरन केंद्र में समर्थन देने की शर्त पर खुद झारखंड के सीएम बन बैठे, लेकिन तमाड़ उप चुनाव हार जाने के बाद उन्हें गद्दी गंवानी पड़ी। उस सदमे के कारण वह गंभीर रूप से बीमार हो गये। बीमारी के बाद भी वह झारखंड का सीएम बनने का सपना देख रहे हैं। इसी कारण वह जामताड़ा से विधानसभा का भी उपचुनाव लड़े और जीते। लेकिन इस बार फिाां बदली-बदली सी है।ड्ढr राज्य में पिछली यूपीए सरकार की गड़बड़ियों का खमियाजा कांग्रेस इस लोकसभा चुनाव में झेल चुकी है। ऐसे में क्या कांग्रेस फिर से झारखंड में सरकार बनाने की कवायद में शामिल होगी, जो शिबू सोरन सीएम बनेंगे?

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