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नई सरकार के लिए दलित एजेंडा

एक अरब से भी अधिक आबादी वाले लोकतांत्रिक देश में राष्ट्रीय सरोकार के मामलों पर आम सहमति बनाना बहुत ही कठिन काम है। खास तौर पर तब जब सामाजिक सरोकार के असंख्य मामले हमारे सामने हों। भारत में आर्थिक सुधार के प्रश्न पर, अपवाद के तौर पर ही सही लगभग आम सहमति है। हालांकि 1में तत्कालीन वित्तमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आर्थिक सुधार लागू किए जान के बावजूद भी आर्थिक सुधार की प्रक्रिया और लाभ को लेकर कुछ मतभेद भी हैं।ड्ढr ड्ढr विशेषकर दलित मध्य वर्ग आर्थिक सुधारों को अवसर के बजाय चुनौती के रूप में ही देखता है। इस तथ्य के बावजूद कि इन सुधारों से विकसित नई अर्थव्यवस्था अनेक जाति-निरपेक्ष काम-धंधों को भी जन्म दे रही है, दलित वर्ग, सुधारों से संबंधित नई राजनीतिक आम सहमति को छह दशक पहले की महा आम सहमति की अवमानना मानता है। सन् 10 में भारतीय गणराज्य की स्थापना के साथ ही भारत के राजनैतिक वर्ग में दलितों को मुख्य धारा के समाज में और उसकी अर्थव्यवस्था में समाहित करन की आम सहमति बन गई थी। अब दलितों को यह चिंता सताने लगी है कि आर्थिक सुधारों के कारण होने वाले निजीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों में कटौती के कारण दलित मध्य वर्ग अब कुछ हद तक अपराध-बोध से ग्रस्त भी रहने लगा है। 1े बाद कांग्रेस और भाजपा-दोनों को ही सत्ता में आन का बराबर अवसर मिला है। यहां तक कि वामपंथियों और क्षेत्रीय पार्टियों ने भी सत्ता में भागीदारी की। लेकिन किसी ने दलितों की इस चिंता को गंभीरता से समझन का प्रयास नहीं किया है। मैं दिल्ली के एक ऐसे उद्यमी को जानता हूं जो भारतीय रेल के लिए तांबे की तार और केबल का निर्माण करता है। यह तथ्य कि उसके उत्पाद का उपयोग भारतीय रेल द्वारा किया जाता है, अपने आप में ही सि करता है कि उसने अब तक अपने माल की गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं किया है। इस प्रकार के माल की प्राप्ति के नियम पुराने खिलाड़ियों के पक्ष में इतने अधिक झुके हुए हैं कि नए खिलाड़ी, विशेषकर दलितों के लिए सप्लाई के इस दुर्भेद्य चक्र में प्रवेश बहुत ही कठिन है। इसलिए इस दलित तार निर्माता के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह पहले अपना माल बिचौलिए को बेचे और फिर वह बिचौलिया रेलव को प्रीमियम पर यह माल सप्लाई करे। बिचौलिया अधिक मार्जिन के कारण अधिक लाभ कमाता है और दलित निर्माता कम। अगली सरकार को चाहिए कि वह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति सप्लायर विकास परिषद जैसी संस्था का गठन करे। इस संस्था का दोहरा दायित्व होगा। यह उन दलित जनजातीय निर्माताओं का पता लगाएगी जो बिचौलियों के माध्यम से पहले से ही सरकार को अपना माल और सेवाएँ सप्लाई कर रहे हैं और फिर उन्हें सीधे ही प्राप्ति विभाग स कनेक्ट कर देगी। अगली सरकार को चाहिए कि अपनी कल्याण योजनाओं को और भी अधिक विश्वसनीय बनाए। सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अपनी आधा मिलियन दुकानों के माध्यम से 33 करोड़ लोगों को कम दाम पर अनाज का वितरण करती है। इस पर हर साल अरबों रुपयों का खर्चा आता है। अब विवादास्पद राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से हर साल और भी अधिक खरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इनके अलावा गरीबों के लिए खरबों रुपयों की और भी कई परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं। मिड डे मील योजना भी है। क्या इन योजनाओं का लाभ उन वगोर्ं को मिलता है, जिनके लिए बनाई गई हैं? जब हम सब जानते हैं कि इन योजनाओं पर लगने वाले खरबों रुपए अपने असली हकदार तक नहीं पहुँचते हैं तो हम इतना पैसा पानी की तरह क्यों बहा रहे हैं और सारे समाज को ही क्यों भ्रष्ट कर रहे हैं? अगली सरकार को चाहिए कि वह सभी पीड़ित परिवारों का एक डेटाबेस तैयार करे, उन्हें पेंशनर घोषित करे और उनके बैंक के खाते में सीधे ही पैसा जमा कर दे। हमें याद रखना होगा कि जब तक काम-धंधे और जाति के बीच कोई सूत्र जुड़ा रहेगा, तब तक भारत के सार्वजनिक जीवन से जातिप्रथा का उन्मूलन नहीं होगा।ड्ढr (युनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के ‘सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी आफ इंडिया’ के सहयोग से प्रकाशित। )

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  • Web Title: नई सरकार के लिए दलित एजेंडा