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दो टूक (02 नवंबर, 2009)

मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग का खामियाजा एक बार फिर देश के सामने है। मनकापुर में खामख्वाह इतनी जानें चली गईं। कार्तिक के पूरे उत्सवी चांद पर अमावस का सोग तारी हो गया। आखिर बड़े पर्व-मेले और बड़ी दूरियां ही भारतीय रेल की फिक्र में क्यों? क्यों इस या उस बहाने लम्बी दूरियों की ट्रेनें तो चलाई जाती हैं लेकिन इलाकाई मेलों-त्योहारों की फिक्र नहीं की जाती?

रेल महकमे की नजर में कार्तिक पूर्णिमा का नहान ‘छोटा’आयोजन है। इलाके की पैसेन्जर ट्रेनें ही इसके लिए काफी हैं। क्या बदलते जमाने और जरूरतों के साथ रेलवे को अपनी सोच बदलनी नहीं चाहिए? क्या छोटे आयोजनों के लिए कम दूरी की दो-चार स्पेशल ट्रेनें नहीं चलाई जानी चाहिए? क्या ऐसे मौकों पर मानवरहित क्रॉसिंग पर अतिरिक्त चौकसी नहीं दिखाई जा सकती?

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  • Web Title:दो टूक (02 नवंबर, 2009)