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क्रिकेटर से राजनेता बनने की चुनौती में फंसे अजहर

पूर्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन के कांग्रेस उम्मीदवार बनने से यह लोकसभा क्षेत्र चुनावी चर्चा के केन्द्र में है। एक अर्से से पीतल नगरी की फीकी पड़ी चमक से लोग हैरान हैं कि यह चुनाव उनके लिए कोई उम्मीद क्यों नहीं जगा पाया! 10 मई की बसपा सुप्रीमो मायावती की रैली ने सभी रैलियों को फीका करके यह सवाल खड़ा कर दिया कि कांग्रेस के पास स्टार हैं लकिन वे बसपा के कार्यकर्ताओं के सामन कैसे टिकेंगे! अजहर को बसपा से कड़ी टक्कर मिल रही है। नेताओं के दौरे खत्म होन के बाद अब घर-घर जाकर पर्ची बांटने के काम के लिए कार्यकर्ताओं के अभाव ने अजहर को इस जमीनी हकीकत से रू-ब-रू करा दिया। लगभग 25 सालों से लोकसभा का चुनाव हारने से पस्त पड़ी कांग्रेस को अजहर ने आकर हौसला दिया। संगीता बिजलानी के साथ सेकुलर इमेज से चुनाव लड़न की उसकी कोशिश को घाघ कांग्रेसी नेताओं ने इस तरह खतरों से लड़ने के बजाए अजहर की धार्मिक पहचान तक ही उन्हें सीमित कर दिया। इसी बदली पहचान की बदौलत कांग्रेस की गैर मौजूदगी के बावजूद अजहर मुख्य टक्कर तक पहुंचे। इसमें संगीता का भी महत्वपूर्ण योगदान शामिल है, जो मुस्लिम महिलाओं में आयशा अजहर व हिंदू महिलाओं में संगीता बिजलानी नाम से चुनाव अभियान बड़ी संजीदगी से संचालित करती रही हैं। क्षेत्र में 55 फीसदी हिंदू व 45 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं जिसमें मुस्लिम मतदाताओं में अजहर का एकमात्र प्रभावी नाम होने से वे मुख्य मुकाबले में टिके तो हैं लकिन उन्हें कोई वाक ओवर मिलेगा? यह कहना कठिन है। सपा का इस क्षेत्र में खास असर है और शफीकुर्रहमान बर्क पार्टी के तीन बार सांसद रह चुके हैं। बर्क के बसपा उम्मीदवार बनन के बाद सपा ने अपनी साइकिल हाजी रिजवान को थमाई। अब यहां सपा की साइकिल जितनी तेज चलेगी, उससे सपा का वोट बढ़न के साथ सीध कांग्रेस का वोट घटेगा। भाजपा के सर्वेश कुमार सिंह इस क्षेत्र की एक सीट से विधायक रह चुके हैं। वह भी अपनी दबंग पहचान और संघ के कार्यकर्ताओं के भरोसे मुकाबले में आन की जी तोड़ कोशिश में हैं।

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  • Web Title: क्रिकेटर से राजनेता बनने की चुनौती में फंसे अजहर