DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सर कलम करने की विचारधारा

अठारह साल की उमर में माक्सर्वाद से मेरा परिचय नहीं हुआ था, न किसी वामपंथी से दोस्ती। लेकिन बीस साल की उमर में जेएनयू की बदौलत इससे जान-पहचान हो गयी। तब तक मैं शायद दुनिया को जानने लगा था इसलिये माक्सर्वादी नहीं बना। दबाव काफी था, दोस्त यारों ने काफी जोर भी डाला था। एक मित्र तो दिन-रात ये समझाने की कोशिश करते थे कि मुझे उनके साथ बिहार जाना चाहिये और वहां क्रांति लाने के लिये काम करना चाहिये। कभी-कभी उलाहना भी देते कि तुम आईएएस बन कर अपने आप को बर्बाद करोगे। उसी सिस्टम का हिस्सा बनोगे, जो शोषण पर आधारित है। खैर उनकी मेहनत जाया गयी।
 
मैं उनसे कहता था कि तीन वजह से मैं वामपंथ के साथ खड़ा नहीं हो सकता। एक, वामपंथ अपने मूल में लोकतंत्र विरोधी है। दो, मानवाधिकार में इसकी कोई आस्था नहीं। तीन, ये हिंसा के कट्टर समर्थक हैं। मेरे मित्र कहते थे कि समाज को बदलने के लिये यह जरूरी है। लेकिन वो कभी इस सवाल का जबाव नहीं दे पाये कि जिस हिंसा के लिये हिटलर की निंदा की जाती है, उसी हिंसा के लिये स्टालिन, माओ की निंदा क्यों नहीं की जानी चाहिये। हिंसा अपने स्वाभाव में गलत है। मेरे वे मित्र अब लेफ्ट की बात थोड़ी कम करते हैं लेकिन दबी जुबान में नक्सलवाद को सही ठहराने का उनका दिल अब भी करता है। और मैं अब भी कहता हूं कि नक्सलवाद से न देश का भला होगा और न ही उस वर्ग का, जिसकी आड़ में ये एक पुलिस वाले की गर्दन कलम करते हैं और राजधानी एक्सप्रेस हाईजैक कर लेते हैं।

यह सही है कि वामपंथ ने दुनिया को पूंजीवादी शोषण से मुक्त कराने में सशक्त भूमिका अदा की। उसकी वजह से गरीब व दबे-कुचले समाज और राजनीति की मुख्यधारा में आ पाये, लेकिन इसकी आड़ में जो तंत्र खड़ा हुआ वह पूंजीवाद से बड़ा शोषक बन गया। वर्ग-संघर्ष और वर्ग-शत्रु के नाम पर जिस कदर हिंसा का सूत्रपात व्लादिमीर लेनिन ने किया, उसकी इतिहास में दूसरी मिसाल नहीं है। दुनिया भर के मार्क्सवादियों के लिये बोल्शेविक क्रांति और उसके नेता लेनिन एक आदर्श की तरह उभरे। दूसरों ने भी कमोवेश उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाया, जिसकी नींव 1917 में सोवियत रूस में रखी गयी थी।
लेनिन की राजनीति के केंद्र में था हिंसा और आंतक। लेनिन ये मानते थे कि बोल्शेविक क्रांति को जिंदा रखने के लिये सर्वहारा और बोल्शेविक पार्टी के दुश्मनों को जीने का हक नहीं है। ये इसी सोच का नतीजा था कि 18 जुलाई 1918 को रूस के पुराने जार सम्राट निकोलस को कैद से निकाल कर गोलियों से भून दिया गया। बात अगर सिर्फ निकोलस तक सीमित होती तो समझी जा सकती थी, लेकिन 18 जुलाई की उस सुबह जार सम्राट के साथ उनकी पत्नी, चार बेटियां, हीमोफीलिक बेटे और कई नौकरों को नींद से उठाया गया, इपातेव हाउस में दीवार के साथ लाइन में खड़ा किया गया और फिर उन पर बंदूक से गोलियों की बौछार कर दी गयी।

लेनिन जैसे-जैसे सत्ता पर कब्जा जमाते गये, उनका पागलपन बढ़ता गया। 11 अगस्त 1918 को पेंजा के बोल्शेविकों को लिखी उनकी इस चिट्ठी के बारे में आप क्या कहेंगे। उन्होने लिखा कि पांच जिलों में बड़े किसानों के विद्रोह को बड़ी बेरहमी से कुचल देना चाहिये। पूरी क्रांति के हित में इस निर्णायक लड़ाई में यह जरूरी है। और इसकी मिसाल बनाई जानी चाहिये। वे आगे लिखते हैं ‘सौ से ज्यादा इन खून चूसने वाले अमीर किसानों को सब लोगों के सामने पेड़ पर लटकाओ, इनके नाम छापो, इनका सारा अनाज छीन लो। ये सब इस तरह से होना चाहिये कि सैकड़ों मील तक लोग इनकी लाश को देख और सुनकर कांपे। सबका गला घोंटकर इन अमीर किसानों को मौत के घाट उतार दो।’ लेनिन की यह चिट्ठी इतनी खतरनाक थी कि इसको अंत तक गुप्त रखा गया और जब सोवियत संघ का पतन हुआ और वामपंथ का अंत तब यह चिट्ठी सामने आयी।

सोचिये, अगर किसी देश का मुखिया इस तरह का आदेश जारी करेगा तो इस आदेश को पालन करने वाले किस हद तक कर गुजरेंगे। हुआ यही। अमीर किसानों को सज़ा देने के नाम पर सैकड़ों-हजारों किसानों को मार दिया गया। यह सही है कि रूस में गृहयुद्घ चल रहा था। बोल्शेविक अपनी सत्ता को बचाये रखने के लिये संघर्ष कर रहे थे। लेनिन ने इसी दौरान पूरे बाकू शहर को जमींदोज करने का निर्देश भी जारी किया था। यह भी इतिहास में दर्ज है कि खुद लेनिन के अपने चचेरे भाई व्लादिमीर अरदाशेव को भी उसकी इस नीति का खामियाजा भुगतना पड़ा था। अरदाशेव को येकतेरिनबर्ग में बोल्शेविको ने इसलिये गोली मार दी कि उसपर बुजरुआ वर्ग का साथ देने का शक था, जो बाद में गलत निकला।

कहा जा सकता है कि लेनिन पर तीन बार जानलेवा हमला हुआ था और एक बार वो मरते-मरते बचे थे। एक गोली उनके गले में जा लगी थी और डॉक्टरों की कोशिश के बाद भी उसे तब निकाला नहीं जा सका था। ये गोली वर्षो उनके गले में फंसी रही थी और अंत समय में जब उनकी तबियत काफी खराब हो गयी थी तभी निकाली जा सकी थी।

स्टालिन ने आगे चलकर जिस तरह से लाखों लोगों का कत्ल करवाया, उसकी प्रेरणा लेनिन से मिली थी। आज के नक्सली भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं और उसी तरह का बर्ताव कर रहे हैं, जैसा उनके आदि गुरु और वैचारिक प्रेरणास्रोत लेनिन ने कभी किया था। नक्सली विकास का कोई आंदोलन नहीं चला रहे हैं। ये वे लोग हैं, जो राजनीतिक सत्ता चाहते हैं और इस सत्ता को पाने के लिये ये हिंसा का सहारा ले रहे हैं। ये बात अरुंधति राय जैसे लोगों को समझनी चाहिये कि बात विकास की नहीं। बात लोकतंत्र की है।

लोकतंत्र में अगर इन नक्सलियों को विश्वास होता तो संविधान के दायरे में रह कर अपनी लड़ाई लड़ते और अल्पमत को बहुमत में बदल कर गरीबों की किस्मत बदलते। ये ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि ये लोकतंत्र के दुश्मन हैं और त्रासदी यह है कि अगर नक्सली कभी केंद्र की सत्ता में आ पाये तो सबसे पहले इनके निशाने पर अरुंधती राय ही होगी और हमारे मित्र भी, क्योंकि तब ये विचारों की स्वतंत्रता की दुहाई देंगे, जो कहीं होगा नहीं। क्योंकि नक्सली विचारधारा में लोकतंत्र नहीं इकतरफा हिंसा है। और सिर्फ एक विचारधारा को स्वतंत्रता।

लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं

ashutosh@network18online.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सर कलम करने की विचारधारा