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उर्दू मीडिया : हल ढूंढने की संजीदा पहल

जिस प्रदेश ने पिछले दो दशकों में डेढ़ हजार दिन हड़ताल के झेले। लगतार 57 दिनों तक कारोबार बिल्कुल ठप रहा। मजदूर और कारोबारी रोजी-रोटी के जुगाड़ में अपने घरों से नहीं निकल सके। हर तरफ बम-गोलियों की गूंज सुनाई देती रही। कत्लो-ग़ारत का माहौल बना रहा। ऐसे सूबे से क्या कोई उम्मीद की जा सकती है?

पिछले बीस साल से जम्मू-कश्मीर इसी दौर से गुजर रहा है। अब तक सूबे में 40 हजार लोग तशद्दुद का शिकार हो चुके हैं। इसके बावजूद इसे फिर से पटरी पर लाने की कोशिश शुरु हो गई है। बेशक ये इतना आसान नहीं, पर नामुमकिन भी नहीं। बशर्ते कोशिशें ईमानदार हों। यह तब और जरूरी हो जाता है। जब बेहिश्त कहे जाने वाली इस सरजमीं के लोगों की कमाई का मुख्य जरिया पर्यटन पूरी तरह चरमरा चुका है।

सैलानी कश्मीर का नाम सुनते ही खौफजदा हो जाते हैं। पहले यहां हरदम फिल्मों की शूटिंग वगैरह हुआ करती थी। अब ऐसा नहीं होता। आम जिंदगी में भी पुलिस और सेना का दखल बढ़ा है। वैष्णो देवी और चरारेशरीफ के दर्शन भी बेगैर संगीन के साए के नहीं होते। ऐसे माहौल में वजीरआजम मनमोहन सिंह, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और रेल मिनिस्टर ममता बनर्जी का कश्मीरियों के बीच जाना। उनकी समस्याएं सुनना-समझना। वाकई काबिले तारीफ है।

अखबार ‘रोशनी’ अपने संपादकीय ‘बदहाल कौम के ठेकेदार’ में कहता है। मेन स्ट्रीम के लीडर हों या अलगाववादी नेता। सभी ने अब तक कश्मीरियों को गुमराहकर कर अपना उल्लू ही सीधा किया। ‘मुंसिफ’ ‘हौसलामंद पेशकश’ में कहता है। सरकार किसी की हो, किसी ने कश्मीरियों के मसले का हल तलाशने की गंभीर पहल नहीं की।
   
मनमोहन सिंह की मौजूदा पहल की आलोचना करने वाले क्या जानें। उन्हें कितनी राहत मिली होगी जो पिछले कई साल से मुसीबत झेल रहे हैं। प्रधानमंत्री का ऐलान उनके लिए किसी रहमत से कम नहीं। उर्दू मीडिया को उम्मीद है कि पीएम, सोनिया गांधी और ममता के हालिया कश्मीर दौरे से वहां के हालात में तेजी से सुधार होगा।
   
रेल मंत्री ने रेलवे की नौकरी में उर्दू में टेस्ट देने की सहूलियत देकर इस दिशा में संजीदा पहल की है। बेरोजगार कश्मीरियों की संख्या कम करने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता था। सोनिया कहती हैं, नया कश्मीर तभी बन पाएगा जब लोग भटकाव और अलगाव का रास्ता तर्क कर देंगे। सरकार ऐसे लोगों को हरसंभव मदद देने को तैयार है। लोगों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार मिले इसके लिए सरकार उद्योगों को बढ़ावा देगी। प्रधानमंत्री ने दक्षिणी-उत्तरी कश्मीर को जोड़ने वाले अनंतनाग-काजी कुंड के 18 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग का उद्घाटन कर इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। समुंद्र से 5166 फीट उंचे इस रेल मार्ग से कारोबार में मदद मिलेगी। बारामूला रेलवे सेक्शन का काम भी लगभग पूरा हो चुका है।

प्रधानमंत्री ने अलगाववादियों को बातचीत का न्योता देकर सकारात्मक पहल की है। इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने कश्मीर आकर बातचीत की पेशकश नहीं की थी। उनकी पहल रंग लाई तो अवश्य ही अलगावादी मुख्यधारा में शामिल हों जाएंगे। यहां वैसे भी अब पहले जैसा आतंकी माहौल नहीं रहा। कश्मीरी पंडित भी घर वापसी को बेताब हैं। शादी-ब्याह के बहाने उनका आना-जाना भी तेज हो गया है।

एक अखबार कहता है कि मनमोहन सिंह ने 2004 में प्रधानमंत्री बनने के बाद कमश्मीर के विभिन्न ग्रुप के साथ गोल मेज कान्फ्रेंसकी थी। 2004 से 07 के बीच श्रीनगर-मुजफराबाद, पुंछ और रावल कोर्ट के रास्ते को दो मुल्कों के रिश्ते सुधारने, कारोबार को बढ़वा देने और कमश्मीर में अमन बहाली के मकसाद से खोले थे। मुंबई पर आतंकी हमला के मुख्य आरोपियों के खिलाफ अब तक ठोस कार्रवाई नहीं किए जाने के बावजूद प्रधानमंत्री ने फिर साहसिक कदम उठाया है।

पाक के सीमांत प्रदेश पेशावर के मीना बाजार में आतंकियों के कार बम हमले में110 लोगों के मारे जाने, अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से भारत की शिकायत करने और जद्दा में ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामी कान्फ्रेंस(ओआईसी) के कश्मीर समले का हल निकालने को मुस्लिम देशों के भारत पर दबाव बनाने की धमकी के बाद भी बिना डिगे। पाकिस्तान से बिना शर्त बातचीत की हामी भर दी है। ‘हमारा समाज’ प्रधानमंत्री के हवाले से कहता है। वे इस बात से बेहद खुश हैं कि वादी के लोगों का देश की जम्हूरियत के प्रति लगाव बढ़ा है। विधानसभा के बाद लोकसभा चुनावों में उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। यहां के लोग हथियार छोड़कर बातचीत शुरु करें तो सारे मसले फटाफट दूर हो जाएंगे।
 
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं

malik_hashmi64@yahoo.com

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