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समता के सच्चे पातशाह

कहा जाता है कि महापुरुष धरती पर तब ही अवतरित होते हैं, जब अत्याचार बढ़ते हैं और धर्म की हानि होती है। वे आकर यहां शान्ति का वातावरण बनाते हैं और लोग चैन की सांस लेते हैं। ऐसी ही महान आत्माओं में गुरुनानक देव की गणना होती है। समाज में समानता का नारा देने के लिए गुरु नानक देव ने कहा कि ईश्वर हमारा पिता है और हम सब उसके बच्चों हैं। पिता की निगाह में छोटा-बड़ा कोई नहीं होता। वही हमें पैदा करता है और हमारा पेट भरने के लिए खाना भेजता है।

गुरु साहिब जाति-पाति का विरोध करते हैं। उन्होंने समाज को बताया कि मानव जाति तो एक ही है, फिर यह जाति के कारण ऊँच-नीच क्यों? गुरु नानक देव जी ने कहा कि मनुष्य की जाति न पूछो, जब व्यक्ति ईश्वर के दरबार में जाएगा तो वहाँ जाति नहीं पूछी जाएगी। सिर्फ उसके कर्म पूछे जाएंगे। इसलिए आप सभी जाति की तरफ ध्यान न देकर अपने कर्मों को दूसरे की भलाई में लगाओ।

जात-पात को समाप्त करने के लिए सभी को समान दृष्टि से देखने के भाव से ही उन्होंने ‘लंगर’ की प्रथा शुरू की थी। जहाँ सब छोटे-बड़े, अमीर-गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी गुरुद्वारे में लंगर की व्यवस्था होती है। जहाँ हर समय हर किसी को भोजन उपलब्ध होता है। उस भोजन में सेवा और भक्ति का भाव मुख्य होता है।

नानक देव जी अपनी गुरुवाणी ‘जपुजी साहब’ में कहते हैं कि ‘नानक उत्तम-नीच न कोई’ अर्थात् ईश्वर की निगाह में सब समान हैं। यह तभी हो सकता है, जब व्यक्ति ईश्वर नाम द्वारा अपना अहंकार दूर कर लेता है। गुरु नानक साहब हिन्दू और मुसलमानों के लिए सेतु थे। हिन्दू उन्हें गुरु और मुसलमान पीर के रूप में मानते हैं। गुरुनानक देव जी एक रहस्यवादी संत और समाज सुधारक थे।

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