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बातचीत की राह

सरकार जानती है कि माओवादियों से बातचीत की राह आसान नहीं है, फिर भी वह उस पर चलने और उसे सुगम बनाने की कोशिश कर रही है। इस सिलसिले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम की हिंसा छोड़ने और बात करने की ताजा अपील महज एक रट नहीं, एक लोकतांत्रिक सरकार की सदिच्छा को भी दर्शाती है। हालांकि माओवादी सरकार की इस अपील को एक जिद्दी और अड़ियल नज़रिया बताते हुए खारिज़ कर रहे हैं।

लेकिन बार-बार की जाने वाली इस अपील का कहीं न कहीं असर हुआ है। यही वजह है कि माओवादियों ने बातचीत के राजमार्ग पर आने के बजाय अपनी-अपनी तरफ से एक पगडंडी सुझाई है। यह पगडंडी हिंसा छोड़ने और हथियार डालने के बजाय दोनों तरफ से युद्धविराम करने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बड़े उद्योगपतियों की उन तमाम परियोजनाओं को रद्द करने की है, जो आदिवासियों को विस्थापित करती हैं। हालांकि उनकी मांगों की फेहरिस्त बहुत लंबी है और उसे मानना किसी भी सरकार के लिए व्यावहारिक नहीं है। लेकिन गृहमंत्री चिदंबरम माओवादियों से भूमि अधिग्रहण, जंगल के अधिकार, उद्योगीकरण और विकास पर बातचीत का प्रस्ताव दे रहे हैं तो जाहिर है कि दोनों तरफ के मुद्दे अलग नहीं हैं।

गृहमंत्री अपने ढंग से संकेत दे रहे हैं और माओवादी अपने ढंग से। फर्क भाषा और नज़रिए का है। जाहिर है कि सरकार को अड़ियल, अतार्किक और अव्यावहारिक कहने वाले माओवादी अगर अपने गिरेबान में झांक कर देखें, तो यह सारे आरोप उन पर ही लगेंगे। फिर उनका यह कहना भी कि उन्होंने जनता के हक के लिए हथियार उठाया है और वे उसे तब तक नहीं रखेंगे, जब तक हर तरह का शोषण और अत्याचार समाप्त नहीं हो जाएगा, यह भी एक तरह की भावुक और अव्यावहारिक ज़िद है।

माओवादियों के यह बयान उनके प्रभाव क्षेत्र से बाहर के किसी व्यक्ति को भड़काने और कभी भी संवाद न करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इसके बाद सिर्फ और सिर्फ कार्रवाई की राह दिखाई पड़ती है। लेकिन ऐसे समय में हमारे समझदार नेताओं का फ़र्ज़ उनके बयानों से माओवादी शब्दाडंबर निकाल कर उसके मर्म को समझने और बातचीत की राह निकालने का है। बातचीत की यह राह काफी घुमावदार और दांवपेच वाली भी हो सकती है। पर सीधे राजमार्ग नहीं मिल रहा है तो पगडंडी से उस पार पहुंचने का प्रयास करने में हर्ज क्या है।

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