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विज्ञान की 10 असाधारण सफलताएं

1. तारों का विश्लेषण
सन् 1842 में लिखी किताब ‘द पॉजीटिव फिलॉस्फी’ में फ्रेंच दार्शनिक अगस्त कमते ने तारों के बारे में लिखा था कि हम कभी तारों की आंतरिक संरचना के बारे में, कैसे उनके वातावरण से ऊष्मा अवशोषित होती है, को समझ नहीं सकते। यही बात उन्होंने ग्रहों के बारे में भी कही थी कि हम ग्रहों के रासायनिक या वहां मौजूद खनिजों के बारे में पता नहीं लगा सकते।

कमते का तर्क ये था कि तारे और ग्रह हमारी पहुंच से काफी दूर हैं। जब हम उनकी दूरी पर काम करेंगे, तब हम उनकी गति और उनके द्रव्यमान को नजरंदाज नहीं कर सकते। किसी रासायनिक तरीके द्वारा हम इसका विश्लेषण नहीं कर सकते, लेकिन इसे कमते की विडंबना कहें या आम आदमी का सौभाग्य कि यह खोज प्रमाणित हो चुकी है। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में विलियम हाइड वॉलेस्टन और जोजेफ वॉन फ्रानहॉफर ने स्वतंत्र रूप से खोज की कि सूर्य के स्पेक्ट्रम में कई डार्क लाइन होती है। 1859 तक इन्हें आणविक अवशोषण लाइन से दिखाया गया। सूर्य में मौजूद प्रत्येक रासायनिक तत्व को लाइन पैटर्न द्वारा पहचाना गया। इससे संभावना बनी कि तारे कैसे बने।

2. नाभिकीय ऊर्जा का दोहन
29 दिसंबर, 1934 को अल्बर्ट आइंसटीन ने पिट्सबर्ग के एक गैजेट में कहा था कि इसके अंश मात्र भी लक्षण नहीं दिख रहे कि अणु ऊर्जा प्राप्त की जा सके। इसका मतलब कि अणु को हमें इच्छा से ही तोड़ना होगा। एनरिको फर्मी ने अपनी खोज में कहा कि यदि यूरेनियम पर न्यूट्रॉन की बमबारी की जाए तो इसे छोटे तत्वों में तोड़ा जा सकता है जिससे ऊर्जा मुक्त होगी।

1939 में नाभिकीय विखंडन को बेहतर तरीके से समझा गया और शोधकर्ताओं ने चेन रिएक्शन को महसूस किया - एक बार चेन रिएक्शन शुरू होने के बाद ये लगातार चलती रहती है जिसके बाद बड़ा विस्फोट होता है। 1942 में इस चेन रिएक्शन को प्रयोगों द्वारा उत्पादित किया गया और 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा पर बम गिरा। 1954 में सोवियत रूस ने अपने ओबनिस्क नाभिकीय पावर प्लांट से नाभिकीय ऊर्जा द्वारा बिजली बनाई। ऐसा करने वाला रूस पहला देश था। 

3. उल्का पिंड स्पेस से आते हैं
मॉडर्न साइंस की शुरुआत और प्रारंभिक विकास के दौरान खगोलविदों ने उल्का पिंडों के अस्तित्व को नकार दिया था। अंतरिक्ष से गिरने वाले पत्थर के प्रति लोगों का अंधविश्वास था। फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस का कहना था कि पत्थर अंतरिक्ष से नहीं गिरते। फायरवॉल और पत्थर की रिपोर्ट लोगों के लिए परीकथा और अफवाह की तरह थी और इन पत्थरों को कभी-कभी ‘थंडरस्टोन’ या बिजली से जले हुए पत्थर कहते हैं। 

1974 में भौतिकविद् अर्नस्ट क्लाडनी ने वाइब्रेशन और अकॉस्टिक पर अपनी एक किताब का प्रकाशन किया जिसमें ये कहा गया था कि उल्का पिंड बाहरी स्पेस से आते हैं। क्लाडिनी की किताब ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ पलास आयरन एंड अदर्स सिमिलर टू इट, एंड ऑन सम एसोसिएटड नेचुरल फिनोमिना’ का उस दौरान उपहास उड़ाया गया। 1803 में उनकी बात न्यायोचित ठहरी, जब जीन बेपीसाइट ने फ्रांस के लांस एंजिल्स में कुछ गिरते हुए पत्थरों का विश्लेषण किया और कहा कि यह आकाश से गिरते हैं।

4. प्लेन का उड़ना
राइट बंधुओं के प्रयोग के बाद कई वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का कहना था कि हेवियर देन एयर फ्लाइट (आम हवाई जहाज) का निर्माण नामुमकिन है। इन वैज्ञानिकों में लॉर्ड कैल्विन भी थे जिन्होंने 1895 में इसका समर्थन किया था, लेकिन आठ वर्ष बाद उनकी बात गलत साबित हुई। हालांकि जब कैल्विन ने अपना बयान दिया था तब कई वैज्ञानिकों का ऐसा मानना था ये प्रयोग करीब-करीब पूरे होने की कगार पर था। 

अठारहवीं सदी के अंत में लोग बैलून में उड़ते थे। 1716 में वैज्ञानिक और सिद्धांतवादी इमानुएल स्वीडनबोर्ग ने अपने एक लेख डिजाइन फॉर ए फ्लाइंग मशीन में फ्लाइंग मशीन के डिजाइन के बारे में लिखा। वे लिखते हैं- ऐसी मशीन के बारे में सोचना आसान है लेकिन इसे वास्तविकता के धरातल पर उतारना मुश्किल है। इसके लिए मानव शरीर की तुलना में कम वजन और ज्यादा बल की जरूरत होगी। स्वीडनबोर्ग का डिजाइन फ्लैपिंग विंग मैकेनिज्म पर आधारित था। हेवियर देन फ्लाइट की परिकल्पना पूरी होने से पहले दो ही बातें संभव थीं। पहला ये कि फ्लेपिंग विंग को हटाकर इसे ग्लाइडिंग मैकेनिज्म से बदल दिया जाए और दूसरा, इंजीनियरों को बेहतर पावर सप्लाई दे सकें। लेकिन विडंबना ये थी कि निकोलस आटो इसे 1877 में पेटेंट करा चुके थे।

5. स्पेस फ्लाइट
अंतरिक्ष पर किसी मिशन को भेजने की बातें लोगों के लिए कपोल-कल्पना हुआ करती थीं। हालांकि इस शक को दूर करने के लिए कई सिद्धांत दिए गए लेकिन सही तकनीक मौजूद न होने के कारण इन्हें मूर्त रूप नहीं दिया जा सका। स्पेस में जाने के लिए एक क्राफ्ट को धरती से 11.2 कि.मी. के पलायन वेग से भेजा जाना चाहिए। ज्यूल्स वर्न ने अपनी किताब ‘फ्रॉम द अर्थ टू द मून’ में एक बड़ी मशीन की बात कही। हालांकि इतनी तेज रफ्तार की वजह से यात्रियों की मौत होने का खतरा था और कैलकुलेशन ये बताती थी कि कोई भी मशीन इतनी शक्तिशाली नहीं थी कि वह इतने वेग को प्राप्त कर सके। 

इस समस्या का हल 20वीं शताब्दी की शुरुआत में दो रॉकेट शोधकर्ताओं कोंस्टेंटिन सियोलकोस्की और रॉबर्ट गोदार ने स्वतंत्र तौर पर काम करके किया। पहले आर्टिफिशियल सेटेलाइट बनने तक दोनों की बातों को लोगों को विश्वास नहीं था। स्पूतनिक 1957 में लांच किया गया और अंतरिक्ष में पहला मनुष्य इसके चार वर्ष के बाद भेजा गया, लेकिन दु:ख की बात ये कि गोदार और सियोलकोस्की इसको देखने के लिए जीवित नहीं थे।

6. गर्म सुपरकंडक्टर
सुपरकंडक्टिविटी के सबसे बेहतर सिद्धांतों के मुताबिक सुपरकंडक्टिवटी 30 केल्विन से अधिक संभव नहीं थी लेकिन कई सुपरकंडक्टर 77 केल्विन पर बेहतर काम करते हैं। सुपरकंडक्टर वे पदार्थ होते हैं जो बिना किसी प्रतिरोध के ऊर्जा का प्रवाह करने में सक्षम होते हैं। इसे 1911 में खोजा गया था। पिछले 50 सालों में कई सुपरकंडक्टिंग पदार्थो को खोजा और उनका अध्ययन किया गया।

1957 में एक थ्योरी जॉन बार्डीन, लियो कूपर और जॉन श्रइफर द्वारा दी गई। इसे ‘बीसीएस थ्योरी’ के नाम से जाना जाता है। इसमें स्टेंडर्ड सुपर कंडक्टर के व्यवहार को बेहतर तरीके से समझाया गया। इसके बाद 1986 में जोहांस जॉर्ज बेडनॉर्ज और कार्ल अलेक्जेंडर मुलर ने ऐसे पदार्थ की खोज की जो कि 35 केल्विन तक सुपरकंडक्टिंग करने में सक्षम है। बेडनॉर्ज और मुलर को इसके लिए भैतिकी के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।

7. ब्लैक होल
ज्यादातर लोग जो कि ये सोचते हैं कि ब्लैक होल आधुनिक खोज हैं। उन्हें ये जानकर आश्चर्य होगा कि पहली बार 1783 में ये विचार सामने आया था। हालांकि 19 वीं शताब्दी तक इस विचार को नया और बेतुका कहकर नकारा जाता रहा। 1915 में अल्बर्ट आइंसटीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत के प्रकाशन के बाद इसे गंभीरता से लिया गया।
आइंसटीन का अनुमान था कि प्रकाश की किरणें गुरुत्व की वजह से डिफलेक्ट हो सकती हैं। आर्थर एडिंगटन ने सूर्य ग्रहण के दौरान तारों की स्थिति का अनुमान लगाया। उन्होंने कहा कि सूर्य के गुरुत्व से उनकी किरणें डिफलेक्ट होती हैं। लेकिन एडिंगटन ने जिस इंस्ट्रुमेंट से इसका मापन किया वह छोटा था। सापेक्षवाद के पूरी तरह स्थापित होने के बाद इसके बारे में कई गंभीर सिद्धांत आए जिसमें सुब्राण्यन चंद्रशेखर का सिद्धांत प्रमुख था। खगोलविदों ने इसके बाद ब्लैक होल के बारे में और तलाश शुरू की ।

8. बल क्षेत्र उत्पन्न करना
विज्ञान की ये कपोल कल्पना 1995 में प्लाज्मा विंडो के बनने तक अनुमानों पर ही आधारित थी। ब्रोकहोवेन राष्ट्रीय प्रयोगशाला के एडी हर्शकोविच ने बताया कि प्लाज्मा विंडो का प्रयोग कर स्पेस के एक छोटे से क्षेत्र को संघनित गैस या प्लाज्मा द्वारा भरने की कोशिश की जाती है। हर्शकोविच और एक्सेलेरॉन ने ऐसी डिवाइस विकसित की जो इलेक्ट्रॉन बीम वेल्डिंग द्वारा ऊर्जा की मांग को कम करने के लिए प्रयोग की जाती है। 

प्लाज्मा विंडो के ज्यादातर गुण बल क्षेत्र से जुड़े होते हैं। इसमें मौजूद मैटर वातावरण और निर्वात के बीच ब्लॉक का काम करता है। इसके अलावा ये लेजर और इलेक्ट्रॉन बीम को बिना किसी अड़चन के आने देता है और अगर आप प्लाज्मा को ऑर्गन से प्रवाहित करें तो ये नीला चमकता है। इसकी एक कमी ये है कि इसे किसी भी आकार की प्लाज्मा विंडो उत्पादित करने के लिए ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होती।

9. अदृश्यता
अदृश्यता विज्ञान की एक कपोल कल्पना की तरह है। भौतिकी का नियम ये नहीं कहता कि अदृश्यता असंभव है। पिछले कुछ सालों में इससे जुड़े कई प्रयोग किए गए। 2006 में इसका एक बुनियादी डिजाइन प्रस्तुत किया गया। डिवाइस मैटामैटीरियल पर निर्भर करती है जो ऑब्जेक्ट के पास के प्रकाश के बारे में जानकारी देता है।

10. टेलीपोर्टेशन
इसे पहली बार पेरानॉर्मि्लस्ट लेखक चार्ल्स ने अपनी किताब ‘लो’ में दिया था और कई विज्ञान लेखकों ने इसका प्रयोग किया। भौतिक विज्ञानी एनटेंगलमेंट नामक एक अजीबो-गरीब क्वांटम प्रयोग से टेलीपोर्टेशन जैसी सफलता हासिल कर भी चुके हैं।

इसमें किसी वस्तु के कण आपस में कितनी भी दूरी के बावजूद एक दूसरे से जुड़े रहते है। यह कण ‘टेलीपोर्ट’ सूचना भेजने के काम आते है। 2002 में बड़े कणों पर इस प्रयोग के बारे में थ्योरी सामने लाई गई। हाल में इसके विपरीत ‘क्लासिकल टेलीपोर्टेशन’ नामक नए विचार में रूबीडियम अणुओं की एक किरण को एक स्थान से गायब करके दूसरे स्थान पर पहुंचाने की बात कही गई।

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