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मन का बल

ई बार साधन, शक्ित, आवश्यकता होने पर भी हमारा मन नहीं चाहता कि कोई काम करे अर्थात् शरीर की क्षमता होने पर भी अगर मानसिक सहयोग न हो, मन में निश्चय न हो ता काम नहीं किया जा सकता। कई बार ऐसा भी होता है कि शरीर सुस्त और रुग्ण है परन्तु मन चाहता है ता काम आसानी से हो जाता है। मनोयोग रहने से व्यक्ित कितनी ही देर, बिना थकान के काम में संलग्न रह सकता है। हमारी वास्तविक शक्ित हमारा मनोबल है। मन के सहयोग और सहायता के बिना हम कोई भी कार्य नहीं कर सकते। जिस इंद्रिय के साथ मन संयुक्त हो जाता है, वही इन्द्रिय काम करती है। यदि मन का सहयोग न हो तो आंख खुली रहने पर भी हम देख नहीं सकते, वस्तु के सूंघने पर भी पदार्थ की गंध का ज्ञान नहीं होता, वस्तु का स्वार्थ होते हुए भी शीत, उष्ण, कोमलता और कठोरता का ज्ञान नहीं होता। दुनिया के सारे काम शरीर के द्वारा किए जाते हैं, परन्तु उनका संचालक और सहयोग देने वाला मन ही है। मन शरीर का स्वाभाविक रक्षक है। जैसे बिजली का अभाव हो ता कोई भी सुविधा उपकरण काम नहीं करेगा। मन में अद्भुत शक्ित है। कोई साधन न होने पर भी मानसिक बल के विश्वासी कभी किसी परिस्थिति से परास्त नहीं होते। जब हम बड़ी से बड़ी और विकट परिस्थिति में भी अपना मनोबल नहीं गिरने देते तो जीत मिल जाती है। जीवन की प्रत्येक गति, क्रिया और चेष्टा मन के द्वारा ही सम्पन्न होती है। मन के निर्देश के बिना न कोई कार्य किया जाता है और न किया जा सकता है। आत्मा के जीवन व्यापार में यह हमारा मन ही सब कुछ करने धरने वाला है। साहसी मनोयोग वाला व्यक्ित अपने जीवन को तपोमय बनाकर आलस्य की बेड़ियों को काट रजोगुण को जन्म देने में सफल हो जाता है। रजोगुण का साम्राज्य शुरू होते ही हमारी बुद्धि से तमोगुण दूर हो जाता है।

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