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आबादी की लयकारी में कहां ढूंढें सम

आबादी की लयकारी में कहां ढूंढें सम

कुछ समय से कोलकता में रह रही हूँ। पर, पूरा जीवन उत्तर प्रदेश खासकर बनारस में ही बीता है इसलिए जब हम अगले दशक की बात कर रहे हैं तो शुरुआत मैं अपने इस प्राचीन व सांस्कृतिक नगर से करना चाहूंगी। वैसे बनारस को उदाहरण के रूप में रखकर प्रदेश के दूसरे महत्वपूर्ण नगरों की समस्याओं को भी समझा जा सकता है। बनारस कला, साहित्य, संस्कृति और धार्मिक दृष्टि से प्रसिद्ध है ही। व्यापार, पर्यटन व शिक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। देश ही के नहीं पूरे विश्व से लोग यहाँ आते और रहते हैं। पर वर्तमान में इस नगर को देखकर कई बार बहुत तकलीफ होती है और अगले दशक की कल्पना से सिहरन हो उठती है।

नगर की आबादी बढ़ती जा रही है। बाहर से आने वालों की संख्या बढ़ रही है। वाहन बढ़ रहे हैं। नागरिक जरूरतों व व्यवसाय की दृष्टि से प्रतिष्ठान बढ़ रहे हैं, लेकिन नगर का विकास व विस्तार नहीं हो रहा है। आपको सड़क पर चलने के लिए रास्ता नहीं मिलेगा। चारों तरफ भीड़ है। जाम लगा रहता है। अगर किसी के घर कोई बीमार हो जाए। दुर्घटना हो जाए तो अस्पताल पहुंचने में उसकी हालत बिगड़ सकती है, क्योंकि उसे पहुंचने मे काफी समय लग जाएगा। बनारस में यह समस्या विकट होती जा रही है। जाम के साथ बनारस में सफाई भी एक बड़ी समस्या है। आप इसकी विश्व प्रसिद्ध गलियों में घूमें या गंगा किनारे-कई बार गंदगी से आपका मन खिन्न हो उठता है। विश्वनाथ मन्दिर सहित कई प्रसिद्ध मंदिर गलियों में हैं तो गंगा की भी पूजा-अर्चना की जाती है। मुझे लगता है कि सफाई व जाम की समस्या प्रदेश के दूसरे शहरों में भी कमोबेश वैसी ही है, लेकिन बनारस में यह थोड़ी विकराल है। इसलिए मेरे विचार से जब हम अगले दशक के उत्तर प्रदेश का स्वप्न बुन रहे हैं तो हमें बढ़ती आबादी के बरअक्स नगरों के सुनियोजित विकास के बारे में सोचना होगा। हम संगीतकार जब कोई बन्दिश उठाते हैं तो लगातार सोचते चलते हैं कि पहले आलाप करना है, फिर विलम्बित में क्या करना है, द्रुत मे क्या करना है, कैसी तानें आएँगी, कितनी मात्रओं, कैसी तिहाइयों को जोड़ते-घटाते सम पर पहुँचना है, लय-ताल की जटिलताओं में कैसे उलझना और निकलना है! यह एक बड़ी चुनौती हमारे सामने, प्रदेश और देश के नेतृत्व, उसकी नौकरशाही के सामने है।

कुछ नगरों के नए इलाको में स्थिति थोड़ी बेहतर दिख सकती है लेकिन वहाँ के पुराने इलाकों की तस्वीर भी वैसी ही है। अब थोड़ी बातें संगीत के भविष्य को लेकर भी करना चाहूँगी। प्रदेश में कई विश्वविद्यालय हैं। नए-नए खुल रहे हैं। शैक्षिक संस्थान खुल रहे हैं, लेकिन हमारे संगीत, खासकर शास्त्रीय-उपशास्त्रीय संगीत के बारे में जिस तरह सोचा जाना चाहिए, नहीं सोचा जा रहा है। वास्तव में यह संगीत दूसरी कलाओं से भिन्न है और इसीलिए शिक्षण-प्रशिक्षण की भी एक अलग व्यवस्था की माँग करता है। इसके लिए गुरुकुल प्रणाली की जरूरत है लेकिन इस बारे में सोचा नहीं जा रहा। मैंने बनारस में ऐसी एक योजना तैयार की थी,पर सरकार से जगह नहीं मिली। शास्त्रीय संगीत को कक्षाओं में पढ़ाया नहीं जा सकता, इसके लिए गुरु और शिष्य के बीच का वह भाव जरूरी है। अगर इस बारे में गंभीरता से नहीं सोचा गया तो हमारी यह परम्परा समाप्त होने की कगार पर पहुँच जाएगी। वास्तव में राजनीतिक जगत में पहले जैसे लोगों की कमी हो चली है।

1952 में सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के सामने गाने के लिए मुझे केवल 10 मिनट का समय मिला था, लेकिन उन्होंने मेरा गाना सुनकर और गाने को क हा। फिर मैं 35 मिनट तक गाती रही। ऐसे संगीत प्रेमी, अपनी कला-संगीत से गहरे परिचित राजनेताओं की कमी होती जा रही है। उस दौर में नेहरू जी थे, सम्पूर्णानन्द जी थे, कई लोग थे। कलाकारों को सम्मान देते थे, लेकिन समय बदल रहा है, लोगों की प्राथमिकताएँ बदल गई हैं, लेकिन यह परिवर्तन केवल अपने ही देश में नहीं है, पूरी दुनिया में हो रहा है। (आलोक पराड़कर से बातचीत पर आधारित)

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