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बाढ़ और सुखाढ़ में डूबता यूपी

उत्तर प्रदेश में सिंचाई व्यवस्था बुरी दौर से गुजर रही है। राज्य का बहुत सारा हिस्सा मानसून के भरोसे है। बारिश न होने से राज्य सिंचाई विभाग के अधीन 50 से ज्यादा झीलों का 75 फीसदी पानी सूख चुका है। बुदेंलखंड में सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। उत्तर प्रदेश में नेपाल की सीमा से लगे क्षेत्रों में हर साल बाढ़ तबाही मचाती है।

उत्तर प्रदेश में घाघरा की कटान जो फैजाबाद से शुरू होकर पूर्वांचल के कई जिलों में बाढ़ लाती है। इस बाढ़ में कई जिलों में भारी मानवीय तबाही मचती है। घाघरा, राप्ती, गंडक, बूढ़ी गंडक और कोसी नदियां कटान के मामलें में अधिक विनाशकारी हैं। नदियों में आती बाढ़ भ्रष्टाचार का भी कारण बन रही है। उत्तर प्रदेश में बाढ़ से बचने के लिए बड़े पैमाने पर बाधों और तटबंधों का निर्माण किया गया है। गोरखपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, तक बांधों तक जाल विछा दिया गया है। ये बांध हर बरसात और बाढ़ में टूटते हैं। बांधों की टूट से मानवीय त्रासदी उत्पन्न होती है। बांधों के रखरखाव और मरम्मत के लिए स्थाई कोष हर साल आता है। लेकिन इन सबमें भ्रष्टाचार का घुन लगा हुआ है। बांधों की उपयोगिता के लिए बहुत बहस हुई, लेकिन इसका विकल्प अभी खोजा नहीं गया है।

यही हाल सूखे का भी है। उत्तर भारत की अधिकांश नदियों का स्वरूप बदल चुका है। गंगा, गोमती, घाघरा जैसी नदियां गर्मियों में सूख जाती हैं। इन नदियों में गाद इतने बड़े पैमाने पर जमा हो चुका है कि इनका जल पीने के लायक भी नहीं बचा है। घाघरा को कभी गंगा से बड़ी नदी कहा जाता था, आज इस नदी में पानी की इतनी कमी है कि इसमें डुबकी भी नहीं लगाई जा सकती है। इन सूखी नदियों को कैसे बचाया जाएगा, इसका कोई उपाय नहीं खोजा जा सका है। इन नदियों की जल क्षमता समाप्त हो चुकी है। इसलिए ये नदियां बरसात में विनाशकारी हो जाती हैं।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में वर्षा जल संचयन अथवा परंपरागत जल स्त्रोतों के पुनरुद्धार की अनेक घोषणाएं जब-तब की जाती रही हैं, लेकिन कोई बुनियादी बदलाव आना तो दूर हालात और बिगड़ते जा रहे हैं। तालाब, पोखर और जलाशय रखरखाव के अभाव में न केवल सूखते जा रहे हैं, बल्कि उन पर अवैध कब्जे भी हो रहे हैं। यह तब है जब इन परंपरागत जल स्त्रोतों पर अवैध कब्जों को हटवाने के लिए उच्च न्यायालय की ओर से कई बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं। एक ऐसे समय जब अनेक क्षेत्रों में जल संकट गंभीर होता जा रहा है तब परंपरागत जल स्त्रोतों के रखरखाव और उनके संरक्षण की योजनाएं तो शासन की प्राथमिकता सूची में होनी चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि न तो ऐसे जल स्त्रोतों का रखरखाव किया जा रहा है और न ही वर्षा जल संचयन के मामले में कुछ ठोस होता हुआ नजर आ रहा है।

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