DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

51 छात्रों पर सिर्फ एक शिक्षक

उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की हालत बहुत ही खराब है। राज्य में एक शिक्षक पर 51 बच्चों का औसत है जबकि राष्ट्रीय औसत 34 छात्रों पर एक शिक्षक का है। स्कूलों में संसाधनों का अभाव है। 13,113 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक उपलब्ध है।

गुणवत्तापरक शिक्षा का भी काफी अभाव है। गुणवत्तायुक्त उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश के कई जिले में बुनियादी शिक्षा के हालात अत्यंत बदतर हैं। हालांकि सरकारी प्राथमिक स्कूलों में साल-दर-साल बच्चों की तादाद बढ़ती जा रही है लेकिन निजी स्कूलों की चुनौती के आगे इनकी प्रगति शून्य है। 2225 सरकारी प्राथमिक स्कूलों में साढ़े तीन हजार शिक्षकों का अभाव है। जून समाप्त होते-होते साढ़े चार सौ प्राइमरी शिक्षक और रिटायर हो जाने से यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है। बारहवीं कक्षा तक के स्कूल जिले में हैं तो 207, लेकिन गुणवत्तायुक्त शिक्षा चंद स्कूलों में ही होती है।

भ्रष्टाचार के घुन ने सर्व शिक्षा अभियान जैसी परियोजना को भी अपने चपेट में ले लिया है। निजी स्कूल साल-दर-साल मशरूम की तरह खुल रहे हैं और तरक्की के रास्ते पर हैं लेकिन सब पढ़ें-सब बढ़ें का नारा देकर चल रहे सर्व शिक्षा अभियान परियोजना के बावजूद सरकारी बेसिक स्कूल खस्ताहाल ही हैं। इस वक्त जिले में 2225 प्राइमरी स्कूल हैं जिनमें 9000 के आस-पास शिक्षकों के सृजित पद हैं, जिनमें साढ़े तीन हजार पद अभी भी खाली हैं। विभाग 40 बच्चों पर एक शिक्षक के अनुपात को नही पूरा कर पा रहा है। मिड-डे-मील योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। बीते शैक्षिक सत्र के दौरान प्रतिमाह किसी न किसी स्कूल में बोगस भोजन वितरण की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रहीं। स्वयं प्रधान और पंचायत सेक्रेटरी ही इस व्यवस्था में खलनायक बन चुके हैं।

सर्व शिक्षा अभियान के अ‌र्न्तगत बन रहे प्राइमरी स्कूल और कमरे बनवाने के फेर में शिक्षक पठन-पाठन छोड़ ठेकेदार बन गये हैं। बीते माह आधा दर्जन गांवो के प्रधानों पर स्कूली इमारत के निर्माण में बाधक बनने का आरोप बीएसए ने ही मढ़ा और डीएम से शिकायत की। आठवीं कक्षा तक बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए स्कूलों में उपलब्ध कराई गई लेडीज साइकिलें परिसर में न रहकर प्रधानों की देहरी की शोभा बन गई हैं। इसी योजना में आये टू इन वन और कैमरे की धनराशि भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी है। चौदह साल तक की उम्र की बालिकाओं की संख्या बेसिक स्कूलों में तीन लाख चौंसठ हजार सात सौ के करीब है लेकिन महकमे के पास इन्हे पढ़ाने के लिए एक हजार शिक्षिकाएं भी उपलब्ध नही हैं। संकट यहीं खत्म नही होता। पांच सौ से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जिनमें प्रधानाध्यापक का कार्य सहायक देख रहे हैं। शिक्षकों की पदोन्नति की प्रकिया सन 95 से ही ठंडे बस्ते में है। सर्व शिक्षा अभियान के आंकड़े बताते हैं कि अभी भी साढ़े चार सौ बच्चे स्कूलों से वंचित हैं।

सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूलो में बहार आई है। लम्बी फीस देकर शहर ही नही ग्रामीणांचल में भी मशरूम की तरह उग आए निजी स्कूलों में प्रवेश का तांता लगा हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि हाईस्कूल में तीस विद्यार्थियों पर एक शिक्षक की तैनाती है।उच्च शिक्षा के अभाव में प्रतिभा पलायन- उत्तर प्रदेश में प्रतिभा पलायन जारी है। कभी उच्च शिक्षा का केंद्र रहे इस प्रदेश से छात्रों का उच्च शिक्षा के लिए पलायन जारी है। संपन्न परिवारों के बच्चे मैनेजमेंट, साफ्टवेयर और तकनीकी शिक्षा के लिए बेंगलुरु, दिल्ली, और दक्षिण के प्रदेशों की ओर रूख कर रहे हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:51 छात्रों पर सिर्फ एक शिक्षक