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ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की धीमी रफ्तार

उत्तर प्रदेश में गांवों की तरक्की एक सपना बन कर रह गया है। जब पूरे देश में गांवों में गरीबों की संख्या बढ़ने की रफ्तार कम हुई है तब उत्तर प्रदेश इस मामले में देश से उलटा चल रहा है। गांवों में ग्रामीण विकास की तमाम स्कीमे राष्ट्रीय औसत से कहीं पीछे चल रही हैं। योजना आयोग के आंकड़े बताते हैं कि केंद्र की मदद से चलने वाली ग्रामीण विकास योजनाओं का भी क्रियान्वयन प्रदेश में ठीक तरीके से नहीं हो पा रहा है। 1952 में पहली पंचवर्षीय योजना से ही गांवों के विकास के लिए योजनाएं शुरू हो गई थीं। आज इनकी संख्या एक दर्जन से अधिक है, पर गांवों की दशा जस की तस है। ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाएं अब भ्रष्टाचार का पर्याय मानी जाने लगी हैं। प्रदेश में न तो सभी के लिए स्वच्छ पेयजल है, न चिकित्सा सुविधा। सड़क, बिजली, शिक्षा व रोजगार का भी बदहाल हैं। निरक्षरता यहां सबसे बड़ा अभिशाप है। महिलाएं सबसे ज्यादा निरक्षर हैं। यहां का किसान अपना पेट भरने को मोहताज है। हां, किसी क्षेत्र में 'उन्नति' हुई है तो वह है, जनसंख्या।

आजादी के समय यहां की आबादी साढ़े छह करोड़ थी जो इस समय 18 करोड़ पार कर गई है। इसके अनुपात में संसाधन लगातार कम होते गए हैं। यही कारण है कि सबसे ज्यादा गरीब लोग यहीं रहते हैं। 240.24 लाख परिवारों में से 99.56 लाख गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। प्रदेश में गांवों के लिए अपनी कोई खास योजना नहीं है। ज्यादातर केंद्र की योजनाएं हैं और सबकी सब भ्रष्टाचार की शिकार हैं। नरेगा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कुछ योजनाएं राज्य सरकार ने शुरू कीं लेकिन धनाभाव में उनका भी बुरा हाल है। इनमें महामाया आवास योजना, सर्वजन आवास योजना, अंबेडकर विशेष रोजगार योजना आदि हैं। इंदिरा आवास योजना के तहत पिछले साल 38 हजार आवास बनने थे, जिसके सापेक्ष 1200 बन पाये हैं।

ग्रामीण विद्युतीकरण योजना, संपर्क मार्ग प्रधानमंत्री सड़क योजना, ग्रामीण रोजगार योजना सबका हाल एक सा ही है। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना का हाल यह है कि 2009 तक सभी गांवों में बिजली आ जानी चाहिए थी, किंतु अभी तक 26 हजार गांवों में ही काम पूरा हो पाया है जबकि विद्युतविहीन मजरों की संख्या 2.40 लाख है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का भी यही हाल है। 2000 में शुरू इस योजना के तहत 2006-07 तक 500 की आबादी वाले सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ने का लक्ष्य था, किंतु 2008-09 तक 12,324 किलोमीटर लक्ष्य के सापेक्ष 5,134 किलोमीटर ही सड़क बन पाई हैं।

गांवों के लिए जो योजनाएं हैं, उन्हें ईमानदारी से लागू किया जाए तो गांवों का कायाकल्प हो सकता है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटित धनराशि से लगभग 800 करोड़ इसलिए वापस हो गए क्योंकि उनका उपभोग ही नहीं हो पाया। विधानमंडल क्षेत्र विकास निधि में हर साल करीब सवा छह सौ करोड़ रुपये जारी हो रहे हैं, पर इस भारी-भरकम निवेश के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाली में सुधार नहीं हुआ।

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