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बड़ी समस्या है लोगों का पलायन

उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए पलायन का सिलसिला नया नहीं है। अंग्रेज यहां के लोगों को बहला-फुसलाकर गिरमिटिया मजदूर के रूप में मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम ले गए थे, जहां कोड़े मार-मार कर उनसे गन्‍ने के खेतों में काम करवाया जाता था। समय का चक्र बदला, अंग्रेज यहां से चले गए और आज गिरमिटियों की संतानें खुशहाली में जी रही हैं।

यहां के श्रमिकों को असम के चाय बगानों में भी ले जाया गया था। तब से वहां जाने का सिलसिला शुरू हुआ। ईंट के भट्ठों में, रिक्‍शे ठेले में जुते हुए, दुकानों में काम करने वाले, गाय-भैंस पालकर दूध बेचने वाले तथा भवन निर्माण और सड़क बनाने के काम में लगे लोग मुख्‍यत: इसी इलाके के हैं। यहां के लोग देश के उन इलाकों में भी अपना पसीना बहाते हैं, जहां रेलें नहीं जातीं। करिगर की बर्फीली पहाडि़यों पर, मणिपुर-नागालैंड और सिक्किम की घाटियों और जंगलों में, पंजाब, हरियाणा, राजस्‍थान के खेतों में, केरल के नारियल-रबर के बगानों में, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, गुजरात के समुद्र तटों और अंडमान तक हाड़-तोड़ मेहनत करके वहां की समृद्धि बढ़ाने वाले उत्तर प्रदेश के लोग हर जगह मिल जाते हैं। लेकिन आज उन्‍हें प्रताड़ित और अपमानित होना पड़ रहा है।

यहां के पढ़े-लिखे युवा जब काम की तलाश में नौकरी आदि के लिए अन्‍य राज्‍यों की ओर रुख करते हैं तो बहुधा उन्‍हें अपमानित होना पड़ता है। देश की आर्थिक नीति ऐसी है कि सारी प्रगति कुछ महानगरों और थोड़े से राज्‍यों तक सिमटी हो तथा ग्रामीण क्षेत्रों और अन्‍य इलाके कंगाली, भूख और गरीबी के अंधकार में डूबे हों तो लोग रोजी-रोटी की तलाश में समृद्ध इलाकों की तरफ ही जाएंगे।

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