DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है उत्तर प्रदेश

किसी भी राज्य के विकास के लिए सबसे जरूरी शर्त है- राज्य में सड़क, पानी और बिजली यानी बुनियादी सुविधाओं का दुरुस्त होना। इन सभी मानकों पर उत्तर प्रदेश दूसरे राज्यों से काफी पिछड़ता दिखता है। 18 करोड़ की आबादी वाला उत्तर प्रदेश मानव संसाधन से तो पूरी तरह संपन्न है लेकिन इसके अलावा राज्य के पास ऐसा कुछ खास नहीं है जिससे वो विकास के मामले में दक्षिण और पश्चिम के राज्यों के आसपास भी खड़ा हो सके।

उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है जहां एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री ही अच्छे से चल सकती है। खेती पर आधारित उद्योग इसलिए भी सफल हो सकते हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश उन राज्यों में से है, जो जल-संपदा के मामले में संपन्न है। देश की 9 प्रतिशत जमीन उत्तर प्रदेश के पास ही है। इसीलिए खेती पर आधारित चीनी उद्योग के मामले में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है। फल-सब्जियां उगाने के मामले में भी उत्तर प्रदेश आगे है। लेकिन चीनी को लेकर सरकार की गलत नीतियों के चलते सभी चीनी मिलें टा उठा रही हैं। राज्य में औद्योगिक सुधार की जरूरत है।

राज्य के विकास के लिए केंद्र से मांगे गए 80 हजार करोड़ रुपए में 22 हजार करोड़ रुपए मायावती ने बेहतर खेती की सुविधाओं पर खर्च करने के लिए ही मांगे हैं। राज्य की बड़ी आबादी अभी भी गांवों में रहती है इसलिए गांवों तक सभी विकास योजनाएं समय से पहुंचे, राज्य के तेज विकास के लिए बहुत जरूरी है। गांव में पंचायती राज लागू करने और सुविधाएं बेहतर करने के लिए मायावती ने 6 हजार 5 सौ करोड़ रुपए मांगे हैं। खेती की सुविधा और पंचायती राज पर अगर 28 हजार 5 सौ करोड़ रुपए की ये रकम सलीके से खर्च हो पाई तो शायद विकास की गाड़ी दौड़नी लग जाए।

वैसे मुलायम सिंह यादव के राज में भी उत्तर प्रदेश के विकास के लिए उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास निगम बना था। अमर सिंह, अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी के प्रभाव में देश के कई बड़े औद्योगिक घराने इसमें शामिल भी हो गए थे। लेकिन अनिल अंबानी के दादरी प्रोजेक्ट को छोड़कर एक भी ऐसा प्रोजेक्ट सुनाई नहीं दिया, जिससे राज्य की बेहतरी की उम्मीद की जा सके। मुलायम सत्ता का सुख भोगकर सत्ता से बाहर भी हो गए लेकिन राज्य का भला नहीं हो सका। राज्य की खराब कानून व्यवस्था की हालत की वजह से किसी भी उद्योगपति की राज्य में उद्योग लगाने की हिम्मत ही नहीं हुई। कानपुर, भदोही, बनारस, मुरादाबाद जैसे पुराने औद्योगिक नगर भी सिर्फ सरकारी वसूली का केंद्र बनकर रह गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश तो विकास के मामले में फिर भी बेहतर है लेकिन बुंदेलखंड और पूर्वांचल का हाल तो बिल्कुल ही खस्ता है।

यूपी में बुनियादी सुविधाओं (बिजली, सड़क और पानी) को दुरुस्त करने की चुनौती है। इन सुविधाओं के अभाव में राज्य में विकास कार्य और निवेश प्रभावित हो रहा है, साथ ही बेरोजगारी भी बढ़ रही है। राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद द्वारा कुछ समय पहले कराए गए एक अध्ययन में साफ हुआ था कि बुनियादी सुविधाओं के मामले उत्तर प्रदेश और बिहार दसवें नंबर के बाद ही आते हैं। बिजली, पानी, सड़क औद्योगिक विकास की बुनियादी शर्तें हैं। ये पूरी नही हो रही हैं। आगरा, कानपुर, लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के सारे बड़े शहर बिजली-सड़क की समस्याओं से जूझ रहे हैं। एक समय में बहुत ही महत्वपूर्ण औद्योगिक शहर रहा कानपुर अब बंद होते उद्योगों की वजह से खबरों में आता है। उत्तर प्रदेश की कंपनियों को शेयर बाजार से पैसा मिलने में दिक्कतें होती हैं। स्थिति यह है कि टाटा मोटर्स कंपनी के अधिकारी पश्चिम बंगाल जैसे उद्योग विरोधी राज्य में अपने नए कार प्लांट लगाने के लिए वहां की सरकार की चिरौरी करते हैं।

और तो और उड़ीसा जैसा पिछड़ा राज्य भी टाटा समूह समेत तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश का केंद्र बन रहा है, मगर उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसी कोई चर्चा तक नहीं है। दक्षिण भारत बनाम उत्तर भारत को बांटकर देखा जाना राष्ट्रीय नजरिए से श्रेयस्कर नहीं है। पर व्यावहारिक तौर पर ऐसा करके देखना आवश्यक है। उत्तर भारत के विकास में क्या योगदान दे रहा है और क्या ले रहा है, इस तरह के सवालों को पूछा जाएगा। क्षेत्रीय विकास के मसले उठने तय हैं। भाषा के मसले भी इससे जुड़े मसले हैं। इनफोसिस कंपनी के संस्थापक नारायण मूर्ति भले ही कानपुर आईआईटी में पढ़े हों, पर इनफोसिस कंपनी के आकार के एक चौथाई सॉफ्टवेयर कंपनी भी कानपुर या उत्तर प्रदेश के शहरों में नहीं है। कॉरपोरेट सेक्टर की टॉप की पांच कंपनियों- ओएनजीसी, रिलायंस, एनटीपीसी, टाटा कंसलटेंसी और इनफोसिस के कारोबार का विश्लेषण करें, तो सिर्फ एनटीपीसी के कुछ संयंत्रों को छोड़कर किसी भी शीर्ष कंपनी के कारोबार में उत्तर भारत के लिए विशेष जगह नहीं है।

उत्तर प्रदेश के निवेशकों को म्युचुअल फंड के बीस से पचास प्रतिशत सालाना रिटर्न देने वाले निवेश की जरुरत है। पर यहां पर म्युचुअल फंड की खास दिलचस्पी नहीं है। म्युचुअल फंड और शेयर बाजारों के बारे में बुनियादी शिक्षण का काम यहां होना बाकी है। यह काम अखबार और टीवी चैनल कर सकते हैं। इसका फायदा आखिरकार प्रदेश के निवेशकों को ही मिलेगा। जनशिक्षण सिर्फ चेरिटी का काम नहीं है, देर-सबेर मीडिया को इसका फायदा भी मिल सकता है। अगर हिंदी भाषी जनता को म्युचुअल फंडों के बारे में कायदे से बताया जाए तो भविष्य में तमाम म्युचुअल फंड हिंदी मीडिया में विज्ञापन देंगे। इसके अलावा माइक्रोफाइनेंस के क्षेत्र में भी राज्य में कोई काम नहीं हो पा रहा है। इस राज्य के भंडारे में तमाम परियोजनाओं का जो महाभोज चल रहा है, उसमें उर्जावान नौजवानों को शामिल नहीं किया जा रहा है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है यूपी