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नई तकनीक करेगी शौचालय में पानी की बचत: यूनिसेफ

यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेन्स इमरजेंसी फण्ड (यूनिसेफ) ने कहा है कि नई पोर फ्लश तकनीक शौचालयों में पुरानी टैंक फ्लश तकनीक के मुकाबले पानी की बहुत ज्यादा बचत करती है और पानी के कम खर्च के लिए इसे पूरे देश में अपनाया जाना चाहिए।

यूनिसेफ के जल पर्यावरण और स्वच्छता (डब्ल्यूईएस) विशेषज्ञ अमित मेहरोत्र ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ में यहां सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के बारे में पत्रकारों को बताया कि पुरानी फ्लश तकनीक में बहुत ज्यादा पानी बर्बाद होता था मगर इस नई तकनीक से काफी पानी बचाया जा सकेगा।

मेहरोत्र ने बताया कि एक ग्राम मानव मल में एक करोड़ बैक्टिरिया एक करोड़ वाइरस और सौ पैरासाइट होते हैं जो स्वास्थ्य के सबसे बड़े दुश्मन हैं। इन्हीं वायरसों से हैजा जैसी बीमारियां फैलती हैं।

उन्होंने बताया कि विश्व में हर साल 25 लाख लोगों की हैजे से मृत्यु होती है और भारत में इनकी संख्या सबसे अधिक है। पीलिया भी इन्हीं विषाणुओं के कारण फैलता है और जब तक सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान को घर घर में नहीं पहुंचाया जाएगा ये बीमारियां जड़ से खत्म नहीं होंगी।

मेहरोत्र ने बताया कि देश की 65 प्रतिशत आबादी शौचालय के लिए घर से बाहर जाती है। उन्होंने कहा कि यूनिसेफ ने सरकार के सहयोग से दो करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया था लेकिन अब तक मात्र एक करोड़ ही शौचालयों का निर्माण हो सका है। ऐसे शौचालयों का निर्माण करने वाले प्रशिक्षित कारीगर बहुत कम हैं। कम से कम हर गांव में एक प्रशिक्षित कारीगर की जरूरत है लेकिन अब तक सिर्फ 16 प्रतिशत कारीगर ही उपलब्ध हैं।

यूनिसेफ के पूर्व क्षेत्र प्रमुख और वर्तमान में सुलभ इंटरनेशनल की सलाहकार समिति के सदस्य यू.डी. माथुर ने बताया कि स्वच्छता को रोजमर्रा के जीवन में अपनाना होगा क्योंकि यह कोई तकनीक न होकर एक आदत है।
माथुर ने कहा कि 70 से 80 प्रतिशत बीमारियां दूषित पानी से ही फैलती हैं और स्वच्छता ही इनका एकमात्र बचाव है।

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