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जहां दूल्हे की मांग भरती है दुल्हन

अभी तक आपने विवाह के दौरान दूल्हे को दुल्हन की मांग भरते देखा होगा मगर छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के उरांव समाज में दुल्हन भी दूल्हे की मांग भरती है। सुहाग को दीर्घायु बनाने के लिए ऐसा किया जाता है।

उरांव समाज में शादी के मंडप में पहले दूल्हे जहां दुल्हन की मांग में सिंदूर डालता है वहीं इसके बाद दुल्हन भी तीन बार दूल्हे की मांग भरती है। दुल्हन का भाई बहन की उंगली पकड़कर दूल्हे की मांग में सिंदूर डालवाता है। दुल्हन का अगर भाई नहीं है तो उसकी बहन इस काम में मदद करती है। ऐसी मान्यता है कि दूल्हे की मांग भरने से शादी के बाद पति पर कोई विपत्ति नहीं आती। और दांपत्य जीवन सुखमय रहता है। यह प्रथा कब से शुरू है, किसी को याद नहीं है। उरांव समाज के लिए दो दशक से कार्य कर रहे जशपुर इलाके के विधायक  जगेश्वर राम बताते हैं, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

दूल्हा-दुल्हन ने शादी के पहले अगर किसी अन्य से शारीरिक संबंध बनाएं हों तो इसके लिए भी व्यवस्था है। इसके लिए फेरे लेने से पहले तीन नोक वाली नौ हल्दी से दूल्हा-दूल्हे को शुद्धिकरण किया जाता है। इसके बाद दूल्हा-दुल्हन पवित्र माने जाते हैं और शादी के पहले जाने अनजाने हुई गल्तियों के लिए वे एक दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। उरांव समाज में गोत्र परंपरा का भी बड़ा महत्व है। एक ही गोत्र में विवाह न हो इसका कड़ाई से पालन किया जाता है। यहीं नहीं, मुर्गे की बलि देने के लिए गोत्र के हिसाब से मुर्गे का रंग तय है। मसलन, किंडो गोत्र वाले लाल और कुजूर गोत्र वाले काले रंग के मुर्गे की ही बलि दे सकते हैं। अभी भी इस परंपरा का पालन किया जा रहा है। 

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