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दो टूक (24 अक्टूबर, 2009)

उपभोक्ता अदालत का यह फैसला वाकई सलाम के काबिल है। फैसले के मुताबिक गर्भावस्था में कराए गए मेडिकल बीमे का फायदा मां को ही नहीं, पेट में पल रहे बच्चों को भी मिलेगा। हर्ष विहार की श्वेता की शिकायत थी कि बीमा कंपनी ने बच्चों की जीवन रक्षा पर आए खर्च का भुगतान करने से मना कर दिया और दलील दी कि बीमा मां का हुआ था, बच्चों का नहीं। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि गर्भस्थ शिशु मां का अभिन्न अंग होता है और उसे भी फायदा मिलना चाहिए। माननीय अदालत का फैसला बचपन के हक में है। यह मातृत्व और वात्सल्य की जीत है। इसे मुनाफाखोरी पर इंसानियत की जीत भी कहा जा सकता है। मूल्यों पर हावी होते बाजार के मौजूदा दौर में ऐसी ही मिसालों को देखकर कुछ उम्मीद बंधती है।

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  • Web Title:दो टूक (24 अक्टूबर, 2009)