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भारत को चाहिए आव्रजन-भय से मुक्ति

महाराष्ट्र के चुनाव हो चुके हैं। उम्मीद की जाती है कि उत्तर भारतीयों के पलायन के खिलाफ कुछ पार्टियों की भीड़खींचू नारेबाजी अब भुला दी जाएगी। इधर जब महाराष्ट्र की राजनीतिक पार्टियां अनावश्यक क्षेत्रीय कट्टरता में उलझी थीं, उस समय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विकास रपट-2009 जारी हुई, जिसका शीर्षक था- अवरोधों के पार : मानवीय गतिशीलता और विकास। मानवाधिकार विकास रपट मूलत: एक ऐसी सालाना रपट है, जो सुपरिभाषित मानदंडों के आधार पर देशों को उनकी उपलब्धियों के मुताबिक उनका क्रम तय करता है। 2009 की ताजा रपट के अनुसार यूएनडीपी के मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) पर 182 देशों में भारत की स्थिति 134 वें नंबर पर है। अपने नागरिकों को बेहतर जीवन स्तर प्रदान करने में भारत की स्थिति में पिछले कुछ सालों में गिरावट आई है। सन् 2007 में भारत 126 वें नंबर और सन् 2008 में 134 नंबर पर था। वैसे कुल मिला कर भारत ने नि:संदेह लगातार प्रगति की है। इस दौरान इसकी मूल्यांकन सूचकांक (वैल्यू) 0.556 से बढ़ कर 0.612 तक पहुंच गया।
 
इस साल यूएनडीपी की रपट ने मनुष्य की ज्यादा गतिशीलता के लिए पूरी दुनिया में उसके रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने पर फोकस किया है। क्योंकि मानव विकास की उपलब्धियों को बढ़ाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारक है। पलायन पर होने वाली बहसें आमतौर पर विकासशील देशों से विकसित देशों की यात्रा पर केंद्रित रहती हैं। फिर भी आंकड़ें बताते हैं कि लोगों की बहुत बड़ी आबादी अपने ही देश में पलायन करती है। रपट का अनुमान है कि आंतरिक आव्रजनों की संख्या 74 करोड़ है, जो कि एक देश से दूसरे देश में जाने वालों की संख्या का चार गुना है। जबकि दुनिया में 20 करोड़ आव्रजन एक देश से दूसरे देश में भ्रमण करते हैं। यहां विशेषज्ञों का मूल निष्कर्ष यह है कि कई वजहों से विकास को गति देने में पलायन की सकारात्मक भूमिका रहती है।
सबसे पहले तो इससे श्रमिकों की उपलब्धता बढ़ती है और मजदूरी की प्रतिस्पर्धा होने से सकल उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है। कई तरह की आर्थिक गतिविधियां ऐसी हैं, जो अप्रवासी मजदूरों के अभाव में प्रतिस्पर्धा खो सकती थीं। आमतौर पर अप्रवासी छोटी नौकरी करें या बड़ी, वे उस देश को अर्थवान और समृद्ध बनाते हैं जहां वे काम करते हैं। इस प्रकार पलायन और विकास में एक तरह का सकारात्मक रिश्ता है।
दूसरी बात यह है कि बाहरी आमदनी चाहे देश के बाहर हो या भीतर, उससे आव्रजनों के मूल स्थान में जीवन का स्तर सुधरता है। इससे विकास का ज्यादा समतावादी वितरण होता है और कई मामलों में इससे शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा लोगों की पहुंच बनती है। ज्यादातर विकासशील देशों में बाहरी आमदनी विदेशी अनुदान के मुकाबले आय का ज्यादा महत्वपूर्ण स्नोत होती है।
तीसरी बात यह है कि जो देश बहु सांस्कृतिक और जातीय विविधता की नीति को बढ़ावा देते हैं, वे इससे तमाम फायदे उठा सकते हैं। अखंडता को बहुसंस्कृतिवाद से जोड़ देने पर स्वीकृत सामाजिक मूल्यों के तालमेल को बिगाड़े बिना उस देश में एक तरह का सांस्कृतिक निषेचन और कायाकल्प होता है।
चौथी बात यह है कि जो आव्रजन अस्थायी होते हैं वे अपने मूल स्थान पर लौटने पर नए विचार, ज्ञान और नए किस्म की प्रौद्योगिकी लेकर आते हैं। इससे समाज का सर्वागीण विकास होता है। इसीलिए कभी- कभी उच्च कुशलता वाले लोग जैसे डॉक्टर, नर्स, शिक्षक और इंजीनियरों का विकसित देशों में पलायन विकासशील देशों के लिए बड़ी चिंता के विषय हो जाते हैं। यूएनडीपी की रपट में मानवीय गतिशीलता को बनाए रखने के लिए छह सूत्री सुधार बताए गए हैं।
पहला ज्यादा मानवीय प्रवाह बनाने के लिए कम कुशलता वाले लोगों के प्रवेश पर लगी रोक को हटाना। दूसरा सुझाव आव्रजनों की स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच बना कर उनके बुनियादी मानवीय अधिकारों की रक्षा करना। तीसरा सुझाव पलायन का खर्च कम करने के बारे में है। इसके लिए एक तरफ शोषक संस्थाओं को नियंत्रित करना और साथ ही इस बात की व्यवस्था करना कि आव्रजन अपनी कमाई कम खर्च पर मूल स्थान को भेज सके। चौथा सुझाव आव्रजन और स्थानीय समुदायों के बीच विवादों के समाधान की समुचित व्यवस्था करने के लिए है। पांचवा सुझाव मूल देश संक्रमण वाले देश और गंतव्य वाले देशों में आव्रजन को एक विकास की रणनीति का मूल तत्व बनाए जाने के बारे में है। छठा सुझाव मंदी के प्रभाव के कारण पैदा हुए उल्टे आव्रजन की स्थितियों से निपटने के बारे में है। निर्यात और रोजगार केंद्रित तमाम उद्योगों में नौकरी के अवसर घट गए ज्यादातर स्थानों में आव्रजन छोटी नौकरियों पर निर्भर हो गए। नए आव्रजन की स्थितियां कम हो गईं। कई मामलों में लोग अपने गांव और घर लौट गए।
संक्षेप में कहें तो दुनिया लगातार सीमाविहीन हो रही है। इससे पता चलता है कि सर्वागीण आर्थिक विकास के लिए आव्रजन को योजनाबद्ध तरीके से प्रोत्साहित करने की जरूरत है। जिन कारणों से आव्रजन होता है, वे अपने में बहुत मजेदार हैं। इसकी सबसे महत्वपूर्ण वजह घरेलू स्तर पर नौकरी और प्रशासन की खराब स्थितियां होती हैं और वह गंतव्य देश में एक बेहतर जीवन स्तर और रोजगार का अच्छा अवसर पाने के प्रयास में जाता है। बेहतर जीवन की लालसा आव्रजन को बहुत कठिन संक्रमण से गुजरने को बाध्य करती है। आप इसे पसंद करें या न करें पर पारस्परिक तौर पर निर्भर विश्व में बढ़ता आव्रजन एक ऐतिहासिक आवश्यकता है।

दुनिया का जोर मानवीय गतिशीलता बढ़ाने पर है। यह विडंबना है कि देश के कुछ हिस्से में कुछ संकीर्ण नजरिए की पार्टियां आंतरिक आव्रजन पर रोक लगाने की मांग कर रही हैं। यह समझदार अर्थशास्त्र और ऐतिहासिक अनुभव के तर्क के विपरीत है। दुनिया का कृत्रिम विभाजन विनाशकारी साबित होगा। यह भारत जैसे विशाल देश में तो और घातक साबित होगा क्योंकि पूंजी, प्रौद्योगिकी, कौशल और इंसान की निर्बाध गतिशीलता की जरूरत है। उम्मीद की जाती है कि महाराष्ट्र में हाल में चली नारेबाजी अब भुला दी जाएगी और आंतरिक आव्रजन की सकारात्मक भूमिका को ज्यादा अच्छी तरह से समझा जा सकेगा। हालांकि यूएनडीपी की रपट भारत के आंतरिक आव्रजन के बारे में बहुत  कम चर्चा करती है लेकिन अब समय आ गया है कि भारत में आंतरिक आव्रजन के फायदों के बारे में एक वस्तुनिष्ठ अध्ययन कराया जाए। एक भारतीय शोध संस्थान की तरफ से होने वाला तटस्थ अध्ययन शंकाओं को भगाएगा और मिथकों को ध्वस्त करेगा। यह आव्रजन को वह वाजिब जगह दिलाएगा जो विकास की रणनीति में उसके लिए होनी चाहिए। 
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लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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