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आदिदेव नमस्तुभ्यम्..

एक वक्त था, जब छठ का बेहद इंतजार करता था। यों मैं छठ नहीं मनाता था। मेरे परिवार में भी छठ मनाने की कोई परंपरा नहीं थी। उसके मायने भी नहीं समझता था। लेकिन बेसब्री से इंतजार रहता था। दरअसल, मेरे दोस्त दीपक सिन्हा जमशेदपुर के थे। उनकी मां छठ करती थीं। उसका प्रसाद कूरियर से हमारे पास आता था। ठिकुआ और कई तरह के सूखे मेवे। आज दीपक और मां दोनों ही दुनिया में नहीं हैं। इसीलिए कोई कूरियर नहीं आता। हां, छठ आती है, तो मन अब भी उदास हो जाता है।

तब हम दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। अपने त्योहारों को ज्यादा समझते नहीं थे। असल में जब प्रसाद आना बंद हो गया, तब उस पर सोचना शुरू किया। ऑफिस आते-जाते छठ को मनते हुए देखा। अब तो छठ दिल्ली का बड़ा त्योहार हो गया है, लेकिन 25 साल पहले यहां कम ही लोग उसे जानते थे। शायद उस प्रसाद का असर रहा या उसकी प्रेरणा कि आज मैं सुबह उठते ही ‘सूर्याष्टकम्’ से अपना दिन शुरू करता हूं। ‘.. आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम् भास्कर।’ सूर्य देव की आराधना का त्योहार है यह। और बेहद मुश्किल व्रत उसके लिए करना पड़ता है। लेकिन अपने परिवार की मंगल कामना के लिए आमतौर पर महिलाएं उसे करती हैं। परिवार के लिए महिलाओं से ज्यादा शायद ही कोई सोचता हो। सूर्य हमारे आदिदेव हैं। मानव को उसके अंधकार काल में सबसे पहले उन्होंने ही अपनी किरणों का सहारा दिया था। अगर यह सहारा हमें नहीं मिला होता, तो शायद दुनिया आगे ही नहीं बढ़ी होती। छठ का पर्व शुरू हो गया है। आज शाम को अस्त होते सूर्य को अघ्र्य देना है। मुङो इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत यही लगती है। चढ़ते सूरज को कौन नहीं पूजता? लेकिन ढलते सूरज को पूजना..!

अस्त होते सूर्य को इसलिए पूजते हैं कि प्रभु आपकी कृपा से ही हमें जिंदगी में रोशनी मिली है। हमारा समूचा तेज आपकी ही देन है। अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य देना कृतज्ञता का ज्ञापन है। अगले दिन उदय होते सूर्य को अर्घ्य देना भावी जीवन की प्रार्थना है। कृतज्ञता और प्रार्थना दोनों जरूरी हैं। कृतज्ञता के बिना प्रार्थना अधूरी होती है न।

 

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