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रिहाई का सौदा

माओवादियों से हथियार डालने की अपील कर रही पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने पुलिस अधिकारी अतींद्रनाथ दत्त को उनके कब्जे से छुड़ाने के लिए खुद ही हथियार डाल दिए।  हालांकि एक ओसी के बदले14 महिलाओं सहित 22 माओवादियों की जमानत का विरोध न कर उनको छोड़ने का फैसला व्यावहारिक भी है और इस प्रकार सरकार किसी वीभत्स घटना की तोहमत अपने सिर लेने से बच गई। छोड़े गए इन लोगों में कोई बड़ा माओवादी नेता नहीं बताया जा रहा है, बल्कि उन्हें सामान्य आदिवासी समर्थक ही कहा जा रहा है। यह बात भी सरकार के पक्ष में जाती है। लेकिन तब सवाल यह उठता है कि अगर वे बेगुनाह लोग थे तो उन्हें पकड़ा क्यों गया और अगर वे सचमुच खतरनाक उग्रवादी थे तो छोड़ा क्यों? यह सही है कि सरकार हर पुलिस कर्मचारी को छुड़वाने के लिए माओवादी कैदियों की रिहाई नहीं कर रही है। कुछ दिनों पहले अगवा किए गए दो सिपाहियों के बारे में कोई सरोकार न दिखाए जाने से पुलिस वालों में नाराजगी भी है। लेकिन ओसी स्तर के पुलिस अफसर के अगवा होने पर भी अगर सरकार हरकत में न आती तो पहले से गिरा हुआ पुलिस का मनोबल और भी गिर सकता था। गिरे मनोबल का प्रमाण इस बात से मिलता है कि अपहरण से छूट कर आए ओसी दत्त फील्ड ड्यूटी की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इन स्थितियों के चलते पश्चिम बंगाल सरकार गहरे धर्मसंकट में पड़ी हुई है। इस संकट में न उसकी विचारधारा काम आ रही है न ही तंत्र।
 
अपने हमलों को लगभग युद्ध घोषित कर चुके माओवादियों से निपटने के लिए वह राज्य के सुरक्षा बलों को सक्षम नहीं पाती। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री से हाल में मिल कर लौटे बुद्धदेव भट्टाचार्य केंद्रीय बलों से किस प्रकार और कितना सहयोग लेंगे यह भी स्पष्ट नहीं हो पा   रहा है। माओवादियों से शांति वार्ता का प्रस्ताव रख रहे केंद्रीय गृहमंत्री पी. सी. चिदंबरम ने भी इस घटना पर कुछ कहने की बजाय राज्य सरकार से ही सवाल पूछने का सुझाव दिया। इससे लगता है कि माओवाद से निपटने में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय रणनीति में विधिवत तालमेल कायम हो पाना अभी बाकी है। भ्रम और विलंब की यह स्थिति माओवादियों की छापामार कार्रवाई में सहायक साबित हो रही है। सरकार मीडिया का उतना उपयोग नहीं कर पा रही है जितना वे लोग कर रहे हैं। ऐसे में सरकारों को व्यावहारिक स्तर पर अपनी दृढ़ता और लचीलापन दोनों को स्पष्ट कर देना चाहिए।

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