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छापे के कनेक्शन

दूरसंचार विभाग के दफ्तरों में सीबीआई के छापों से यह लगता है कि सरकार 29 स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में कुछ कार्रवाई करना चाहती है। दूरसंचार मंत्री ए. राजा का कहना है कि उन्होंने सारा काम नियमानुसार किया है और उनकी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम का आरोप है कि कांग्रेस अपने छोटे सहयोगी को दबाना चाहती है। उनका शोर मचाना इसलिए समझ में आता है कि उनका कहना है कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं, जबकि जानकार मानते हैं कि इस घोटाले से सरकार को 20,000 से 25,000 करोड़ का घाटा हुआ। अगर स्पेक्ट्रम आवंटन में ‘पहले आएं, पहले पाएं’ की जगह खुली नीलामी का तरीका अपनाया जाता तो इतनी ज्यादा आमदनी सरकार को हो सकती है। इस वजह से संप्रग सरकार के पिछले कार्यकाल के अंतिम दौर में बड़ा विवाद हुआ था और नई सरकार में कांग्रेस ए. राजा को शामिल करना नहीं चाहती थी। आखिरकार द्रमुक के दबाव में राजा को शामिल किया गया, इसलिए यह बताना मुश्किल है कि सीबीआई के हाथ कितनी दूर तक पहुंच सकते हैं। लेकिन ऐसे घोटाले पकड़ना और उन्हें रोकना हमारी अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिए जरूरी हैं। जब भी कहीं किसी नियंत्रित अर्थव्यवस्था में उदारीकरण होता है तो काफी सारी ऐसी संपत्ति निजी हाथों में जाती है, जिसे राष्ट्रीय संपत्ति कहा जा सकता है। ऐसे में भ्रष्ट नेता नौकरशाह पूंजीपतियों से मिलकर औने-पौने दामों में उसे ठिकाने लगाते हैं। इससे देश का नुकसान तो होता ही है, कानून सम्मत और साफ-सुथरा आर्थिक माहौल भी नहीं बनता, जो आर्थिक तरक्की के लिए जरूरी है। राष्ट्रीय संपदा पर काबिज एकाधिकारवादी पूंजीपति उसका अनाप-शनाप दोहन करके समाज को चूना लगाते हैं। स्पेक्ट्रम आवंटन भी ऐसा ही मामला है। मौजूदा दूरसंचार परिदृश्य में स्पेक्ट्रम एक कीमती संपदा है और वह सीमित भी है। उसे सस्ते में बेचना तो गलत था ही, इस गलती से आगे भी ढेर सारी आर्थिक अनियमितता के लिए रास्ता खुला। जमीन से लेकर तेल के कुंओं तक में जैसे विवाद सामने आ रहे हैं, उससे पता चलता है कि सारे नेता या नौकरशाह देश की जनता के हितों को लेकर वैसे गंभीर नहीं हैं, जैसा उन्हें होना चाहिए। प्रधानमंत्री ऐसे घोटालों और घोटालेबाजों के खिलाफ रहे हैं लेकिन उन्हें उनसे निपटने के लिए जिस राजनैतिक शक्ति की जरूरत है, वह क्या सरकार और कांग्रेस पार्टी दिखा पाएगी?

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