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कहां गई सुरक्षित रेलयात्रा की मंगलकामना

मैं गत 45 वर्षो से भी अधिक से एक दैनिक रेल यात्री हूं और कई बार रेल उपयोगकर्ता सलाहकार समिति रेलवे का सदस्य भी रह चुका हूं। दुर्घटनाएं होती हैं, उनमें से अधिकतर रेल प्रशासन व रेल कर्मचारियों की लापरवाही के कारण ही होती हैं और यात्रियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। कितने आश्चर्य की बात है कि जो रेल प्रशासन यात्रियों के जीते जी आसानी से रेल टिकट नहीं दे पाता, वही प्रशासन यात्रियों को मरने के बाद लाखों का मुआवजा देता है। स्टेशनों पर उद्घोषणाएं होती हैं कि हम ‘यात्रियों की सुखद, सुरक्षित और मंगलमय यात्रा की कामना करते हैं’ यह आपके भाग्य पर निर्भर है कि आप अपने घर पहुंचें या न पहुंचें।
एम. बी. दूबे ‘बिजनौरिया’,
सचिव, दैनिक यात्री संघ, शाहदरा, दिल्ली

डॉल्फिन को राष्ट्रीय सम्मान
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण की सभा ने खतरे में पड़ी डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा देकर इसकी महत्ता को बढ़ा दिया है। डॉल्फिन की लुप्त होती प्रजाति को बचाने के ये भागीरथी प्रयास दो-तीन दशक पहले ही प्रारम्भ हो जाने चाहिये थे। डॉल्फिन की प्रजातियां विलुप्त होने से बचा ली जाएं तो इसका गंगा के स्वास्थ्य पर भी लाभदायक प्रभाव पड़ने की संभावना है। गंगा के पावन जल में डॉल्फिन के कद्रदानों को रुचि के अनुरूप लेखन साहित्य में सामग्री उपलब्ध हो जाएगी।
युगल किशोर शर्मा, फरीदाबाद

कभी टीचर मत बनना
मैं गरीब ग्रामीण पृष्ठभूमि से संबंध रखता हूं। माता-पिता दोनों अनपढ़ थे। मैं स्वयं किसी तरह भोपाल (मध्य प्रदेश) में एक प्राइवेट नौकरी कर 1994 में भोपाल से एमए हिंदी साहित्य में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया, फिर वहीं से बीएड भी किया। दिसम्बर 1996 में मुङो शिक्षक ग्रेड-1 की नौकरी मिल गई। एक गरीब माता-पिता को कितनी खुशी होती है, यह सुनकर कि उनका बेटा शिक्षक ग्रेड-1 में हो गया है। लेकिन यह एक अस्थायी नौकरी 3 वर्ष के लिए थी। मेरे तीन वर्ष पूरे करने के पश्चात जब चयन समिति के सदस्यों ने मुझसे 50,000 रुपए की मांग की जिसे पूरा नहीं कर पाने के कारण मेरा चयन नहीं हो सका और आज मैं एक प्राइवेट कंपनी, दिल्ली में मात्र 5000 की नौकरी 10 वर्षो से कर रहा हूं। आज मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन का काफी समय जो एमए, बीएड में लगाया तीन वर्ष शिक्षा विभाग की सेवा में लगाया वह बेकार गया। अब तो ऐसा लगता है कि यदि नौकरी चाहिए तो टीचर मत बनिए।
शिव बहादुर सिंह, 506, खारी बावली, लाहौरी गेट, दिल्ली

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